बुधवार, 27 मार्च 2013

तुम्हारे कोमल गालों के गुलाल


होली
कैलाश झा किंकर

होली
आई झूमकर,
फगुनाहट
के साथ
सारी
खुशियाँ गईँ
सचमुच
सबके हाथ।

सचमुच
सबके हाथ
हुए
हैँ लाल-गुलाबी
लगा
रहे हैँ लोग
रंग
खुश-रंग जवाबी।

कह
किँकर कविराय
सजी
मस्तोँ की टोली
मना
रहे हैँ आज
चतुर्दिक
होली-होली।



















 

वे सारे रंग
जो साँझ के वक्त फैले हुए थे
क्षितिज पर
मैंने भर लिया है उन्हें अपनी आँखों में
तुम्हारे लिए

वर्षों से किताब के बीच में रखी हुई
गुलाब पंखुड़ी को भी निकाल लिया है
तुम्हारे कोमल गालों के गुलाल के लिए



तुम्हारे जाने के बाद से
मैंने किसी रंग को
अंग नही लगाया है
आज भी  मुझ पर चड़ा हुआ है
तुम्हारा ही रंग
चाहो तो देख लो आकर एकबार
दरअसल ये रंग ही
अब मेरी पहचान बन चुकी है

तुम भी  कहो  कुछ
अपने रंग के बारे में ....

7 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ..चौहान जी , बहुत शुक्रिया ...होली मुबारक हो ....सादर
    -नित्यानंद गायेन

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  2. 'होली और तुम्हारी याद' नित्यानंद गायन
    अवसर के अनुरूप सौंदर्य से ओतप्रोत कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति अंतर्मन को स्पर्श करने में पूर्ण-रूपेंण सक्षम है !
    कवि हार्दिक बधाई के पात्र हैं !
    निवेदक : हैरिसन

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    उत्तर
    1. शुक्रिया सर .

      सादर

      नित्यानंद गायेन
      आपका

      हटाएं
  3. samyik poems. badhaee..

    Anil kumar

    जवाब देंहटाएं
  4. होली की हार्दिक शुभकामनाएं व बधाई..

    जवाब देंहटाएं
  5. तुम्हारे जाने के बाद से
    मैंने किसी रंग को
    अंग नही लगाया है
    आज भी मुझ पर चड़ा हुआ है
    तुम्हारा ही रंग
    चाहो तो देख लो आकर एकबार
    दरअसल ये रंग ही
    अब मेरी पहचान बन चुकी है

    अति सुंन्दर

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