मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

शिरोमणि महतो की दो कविताएं





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शिक्षा  - एम हिन्दी

सम्प्रति  - अध्यापन एवं महुआ पत्रिका का सम्पादन

प्रका - - कथादेश, हंस, कादम्बिनी, पाखी, वागर्थ, कथन, समावर्तन, पब्लिक एजेन्डा, समकालीन भारतीय साहित्य, सर्वनाम, युद्धरत आम आदमी, शब्दयोग, लमही, पाठ, पांडुलिपि, हमदलित, कौशिकी, नव निकश, दैनिक जागरण पुनर्नवा विशेषांक ,दैनिक हिन्दुस्तान, जनसत्ता विशेषांक, छपते-छपते विशेषांक, राँची एक्सप्रेस, प्रभात खबर एवं अन्य दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

 शिरोमणि महतो की दो कविताएं

भात का भूगोल

पहले चावल को
बड़े यत्न से निरखा जाता
फिर धोया जाता स्वच्छ पानी में
तन-मन को धोने की तरह

फिर सनसनाते हुए अधन में
पितरों को नमन करते हुए
डाला जाता है-चावल को
अधन का ताप बढ़ने लगता है
और चावल का रूप-गंध बदलने लगता है

लोहे को पिघलना पड़ता है
औजारों में ढलने के लिए
सोना को गलना पड़ता है
जेवर बनने के लिए
और चावल को उबलना पड़ता है
भात बनने के लिए
मानो
सृजन का प्रस्थान बिन्दु होता है-दुख !

लगभग पौन घंटा डबकने के बाद
एक भात को दबाकर परखा जाता है
और एक भात से पता चल जाता
पूरे भात का एक साथ होना
बड़े यत्न से पसाया जाता है मांड
फिर थोड़ी देर के लिए
आग में चढ़ाया जाता है भात को
ताकि लजबज रहे

आग के कटिबंध से होकर
गुजरता है-भात का भूगोल
तब जाके भरता है-
मानव का पेट-गोल-गोल !



छोटे शहर में प्यार

छोटे शहर में प्यार
पनपता है धीरे-धीरे
पलता है लुक-छुपकर
आँखों की ओट में
हृदय के तल में

छोटे शहर में
फैल जाती है-प्यार की गंध
इस छोर से उस छोर तक
धमधमा उठता है-
पूरा का पूरा-छोटा शहर

छोटे शहर का आकाश
बहुत नीचा होता
और धरती बहुत छोटी
जहाँ परींदे पंख फैलाकर
उड़ भी नहीं सकते

छोटे शहर में
प्रेमियों के मिलने के लिए
कोई गुप्त सुरक्षित जगह नहीं होती
कोई सिनेमा घर होता
बाग-बगीचे
और ही किलाओं का खण्डहर
जहाँ दो-चार पल
जिया जा सके एक साथ
और सांसो की आँच से
सेंका जा सके प्यार को !

छोटे शहर में
प्रेमियों का मिलना कठिन होता है
वहाँ हर घर के कबूतर
हरेक घर की मुर्गियों को पहचानते हैं
दो प्रेमियों को मिलते देखकर
कोई मुर्गा भी शोर मचा सकता है !

छोटे शहर में दो प्रेमी
एक-दूसरे को देखकर
मुस्कुरा भी नहीं सकते
आँखों की मुस्कुराहट से
करना होता है-संवाद
और संवेदना का आदान-प्रदान !

छोटे शहर में प्यार
बहुत मुश्किल से पलता है
पूरा का पूरा छोटा शहर
बिंद्या होता है-
घरेलू रिश्तों की डोर से
जिसमें प्रेम के मनके गूँथे नहीं जाते !

छोटे शहर में
चोरी-छिन्नतई जायज है
गुंडई-लंगटई जायज है
यहाँ तक कि-मौज मस्ती के लिए
अवैध संबंध भी जायज है
किन्तु प्यार करना पाप होता
एक जघन्य अपराध होता
प्रेम करनेवालों को चरित्रहीन समझा जाता है

छोटे शहर में प्यार को
हवा में सूखना पड़ता है
धूप में जलना पड़ता है
आग निगलना पड़ता है
और खौलते हुए तेल में
उबलना पड़ता है
इसके बावजूद साबुत बचे तो
लांघनी पड़ती हैं-
और कई अलंघ्य दीवारें !

वैसे तो
छोटे शहर में
प्रेम से ज्यादा
पेट के सवाल लटके हुए होते
हवाओं में काँटों की तरह
जो आत्मा को कौंचते रहते हैं
और कई बार
प्रेम-भूणावस्था में ही नष्ट हो जाता है !
    
छोटे शहर में प्यार
अक्सर अपने पड़ाव तक
नहीं पहुँच पाता
उसे झेलना पड़ता है-
विरह
या फिर-निर्वासन 
!

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