सोमवार, 23 अप्रैल 2018

जयप्रकाश मानस की 3 कविताएँ

 
                                          2 अक्टूबर, 1065, रायगढ़, छत्तीसगढ़


1-याद न आये जिसे



पानी देखते ही नदी

नदी देखते ही नाव

नाव देखते ही नाविक

नाविक देखते ही पतवार

पतवार देखते ही पेड़

पेड़ देखते ही गाँव

गाँव देखते ही बढ़ई

बढई देखते ही बसूला

बसूला देखते ही लुहार

लुहार देखते ही धार

धार देखते ही पानी

सबको जोड़ती कोई एक कहानी

याद न आये बरबस जिसे

क्या-क्या याद दिलायें उसे ?



2-बचे या न बचे

 
रखनी ही होगी सँभालकर   

माँदल की थाप

दुखों को रौंदते हुए घुंघरुओं की थिरकन
सदियों पुरानी रागिनियों से सांत्वना बटोरती
रात की ढलान

दूर-दूर पहाड़ियों पर
मेमनों के लिए
घास का पताका फहराती हरियाली
दुनिया को जगमगाती ओस    
मौमाखियों के छत्ते
आँधियों से बचे डगाल पर लटकते
घोंसले में चूजों के चोंच पर
दाना रखती बया

खेत पर रतजगे के अलाव के लिए
हरखू की चकमक
ऐपन ढारती नई बहू
अपने हिस्से के काम जैसे
पुरखों की वाचिक परम्परा में कोई आत्मकथा

कुछ सँभले या न सँभले
कुछ बचे या न बचे
टूटता-बिखरता ढाई आखर ज़रूर सम्हले / धूप-छाँही रंग में
सँभाल रखना ही है /फिर-फिर उजड़ने के बाद भी
बसती हुई दुनिया के लिये



3-अंत में कुछ भी ज़रूरत कहाँ कभी किसे


मिले न मिले -
कंठ को दो बूँद पानी
कांधे बिठाने दो-चार आदमी
नख से शिख ढँकने पाँच-छह फ़ीट की मार्किन
लाई संग पैसे छिड़कने सात सगे मतलबी हरामी

अंत में
अंत में कुछ भी ज़रूरत कहाँ कभी किसे



मिले न मिले
देह को हल्दिया उबटन
बोतल में पपड़ायी सात-सात नदियाँ
विदाई के वक़्त बेमन विलाप करने वाली स्त्रियाँ
टूटी-फूटी पुरानी खटिया, खटिये पर घी के दीये
अंत में
अंत में कुछ भी ज़रूरत कहाँ कभी किसे



मिले न मिले
पितरों के साथ पिंडदान
लोभी-लालची पुरोहित के मुँह गरुड़ पुराण    
दसगात्र के दिन खीर पूरी मालपुआ, मौज करे समधियान
अंत में
अंत में कुछ भी ज़रूरत कहाँ कभी किसे

अंत से पहले है ज़रूरत
अंत के पहले हैं सपने
अंत से पहले है दुनिया
अंत से पहले है भविष्यत् अंत के पहले हैं अपने ।

अंत के बाद कहाँ माटी
अंत के बाद कहाँ सोना

अंत से पहले ही हँसना
अंत से पहले ही रोना ।
संपर्क सूत्र- 
जयप्रकाश मानस
संपादक, www.srijangatha.com
एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा
रायपुर, छत्तीसगढ़-492001
मो
0-94241-82664

ईमेल- srijangatha@gmail.com

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

विस्थापन का दर्द आज भी सालता है : साक्षात्कार




 बाएं से श्री रामदेव धुरंधर जी दाएं गोवर्धन यादव

     मारीशस के प्रख्यात साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी को श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफ़को साहित्य सम्मान जिसमें उन्हें ग्यारह लाख  रुपये एवं प्रश्स्ति पत्र देकर 31 जनवरी 2018 को दिल्ली में सम्मानित किया गया।
उनका साक्षात्कार इंटरनेट के माध्यम से लिया है गोवर्धन यादव ने । प्रस्तुत है साक्षात्कार की कड़ियां ……क्रमश:

गोवर्धन यादव - उन दिनों वहां की सरकार जनता पर निर्ममता से अत्याचार करती रहती थी. निश्चित ही आपका परिवार इस भीषण यंत्रणा का शिकार हुआ होगाइस अत्याचार को परिवार ने कैसे झेला और आप पर इसका कितना असर हुआ?  आपकी पढ़ाई-लिखाई पर कितना असर पड़ा?
धुरंधर जी - ज़मीन फ्रांसीसी गोरो की होती थी जो लोगों को पट्टे पर ईख बोने के लिए दी जाती थी। मेरे पिता के भी खेत हुए। गोरों ने जब देखा था भारतीय मन के लोग उन के बंधन से मुक्त होने के लिए प्रयास कर रहे हैं तो उन्होंने देश व्यापी अपना अभियान चला कर एक साल के भीतर लोगों के सारे खेत छीन लिये थे। मेरे पिता खेत छीने जाने के दुख के कारण मानो निष्प्राण हो गए थे। दोनों बैलगाड़ियाँ बिक गईं। गौशाला में दो गाएँ थीं तो माँ ने किसी तरह दिल पर पत्थर रख कर एक गाय बेची और एक गाय को अपने बच्चों के दूध के लिए बचा लिया। पथरीला सोना उपन्यास में मैंने लालबिहारी और इनायत नाम के दो पात्रों के माध्यम से इस घटना का मर्मभेदी वर्णन किया है। मेरे पिता के सिर पर कर्ज़ था। घर के सभी को मिल कर किसी तरह कर्ज़ से उबरना था। परिवार की शाखें बढ़ते जाने से आवश्यक था मकान बड़ा हो। ऐसा नहीं कि यह सब हौआ हो जो हम को लील जाए। हिम्मत से इन सारी कठिनाइयों पर जय की जा सकती थी और हम जय कर भी रहे थे। बस हमारी गरीबी की चादर बहुत दूर तक फैल गई थी। योजना से काम लेना पड़ता था ताकि अपने लक्ष्य पर पहुँच कर तसल्ली कर पाएँ कि हम ने कुछ तो किया। मुझ से बड़े मेरे दो भाई थे। मुझ से छोटी एक बहन और एक भाई। दोनों बड़े भाई खेत के कामों में पिता का हाथ बँटाते थे। गरीबी और अस्त व्यस्तता की उस दयनीय रौ में मेरी पढ़ाई छूट सकती थी। पता नहीं मेरे परिवार में वातावरण कैसे इस तरह बन आया था कि केवल मैं पढ़ाई में आगे निकलता जाऊँ और मेरे भाई बहन मानो कुछ - कुछ पढ़ाई से अपनी उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ते जाएँ। पर आने वाले दिनों में मेरी पढ़ाई गंभीर रूप से बाधित हुई। मेरी पढ़ाई व्यवस्थित रूप से न  हो सकी तो इस का कारण घर का बँटवारा था। दोनों बड़े भाइयों की शादी होने पर वे अपने कुनबे की चिंता करने लगे थे। उन के अलग होने पर हम माता - पिता और तीन बच्चे साथ जीने के लिए  छूट गए। यहाँ भी वही हुआ हमें जीना था तो हम जी लिये। यहीं मुझे मज़दूरी करने के लिए कुदाल थामनी पड़ी जो वर्षों छूटी नहीं। इस बीच पिता बीमार हुए तो स्वस्थ हो पाना उन के लिए स्वप्न बन गया.        
गोवर्धन यादव -  मेरा अपना मानना है कि किसी भी भाषा को यदि बचपन से सीखा जाए तो वह जल्दी ही आत्मसात  हो जाती  है. जब आपने हिन्दी सीखना शुरु किया तब तक तो  आपकी उम्र लगभग 20-21  वर्ष की हो चुकी होगी. इस बढ़ी उम्र में आपको निश्चित ही दिक्कतें भी खूब आयी होंगी?
धुरंधर जी - बचपन में मुझे अपने पिता की ओर से हिन्दी का संस्कार मिला था। जिसे वास्तविक हिन्दी का ज्ञान कहेंगे वह बाद में मेरे हिस्से आया। मैं आत्म गौरव से कहता रहा हूँ हमारे देश में हिन्दी के उत्थान के लिए काम करने वाली हिन्दी प्रचारिणी सभा के सौजन्य से मैं व्याकरण सम्मत हिन्दी सीख पाया था। हम तीस तक विद्यार्थी एक कक्षा में पढ़ते थे जिन में से दो तिहाई विवाहित थे। स्वयं मेरे दो बच्चे थे। एक महिला की तो दो बेटियों की शादी हो गई थी। मेरी निजी बात यह है मेरी गरीबी के बादल मेरे सिर पर तने हुए थे परिणाम स्वरूप बस का भाड़ा चुका कर जाने में मुझे तंगहाली से गुजरना पड़ता था। पढ़ाई का लक्ष्य यही था हिन्दी सीख लूँ ताकि हिन्दी अध्यापक बनने का मेरा रास्ता सहज हो सके। वैसेमैंने इस बीच पुलिस बनने के लिए हाथ - पाँव मारने की कोशिश की थी। यदि पुलिस की नौकरी मुझे पहले मिल जाती तो मैं इधर का आदमी न हो कर उधर का होता। मैंने चोरों की गिरेबान पर हाथ खूब रखा होता और उसी अनुपात से अपना ईमान रिश्वत को प्रतिदान में दे कर सोचता कि मैं तो उसी धारा में बह रहा हूँ जिस धारा का सभी भक्ति वंदन कर रहे हैं। मेरे बिना हिन्दी अनाथ तो न होतीलेकिन मैं स्वयं के साक्ष्य में कह रहा हूँ मेरे नाम से हिन्दी की इतनी कृतियाँ नहीं होतीं। मैं हिन्दी का पर्याय न होता और हिन्दी की दुनिया मुझे जानती तक नहीं। आज हिन्दी से अपनी पहचान का मुझे बहुत फक्र है। हिन्दी मेरे प्रति हुई भी ऐसी उस ने मुझे अनाथ नहीं छोड़ा। हिन्दी ने मुझे रोटी दी और मैंने इसी भाषा के बूते अपने बच्चों को पढ़ाया।
गोवर्धन यादव- मारीशस में आम बोलचाल  की भाषा कृओल है जबकि सरकारी भाषा अंग्रेजी है.  इन दो भाषाओं के बीच हिन्दी अपना स्थान कैसे बना पायीक्या कोई ऎसी संस्था उस वक्त काम कर रहीं थी, जो हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए कटिबद्ध थी?
धुरंधर जी - भारतीयों के आरंभिक दिनों में तो निश्चित ही बहुत अंधेर था। कालांतर में हिन्दी का गवाक्ष खुला और वह अपनी मंजिल की तलाश के लिए व्याकुल हो उठी। जैसे तैसे हिन्दी परवान चढ़ती गई और उस ने देश व्यापी बन कर जन जन के मन में जैसे लिखा मैं इस देश में समर्थ भाषा के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहती हूँ। हिन्दी ने नाम तो पाया, लेकिन दुख तो मानेंगे उसे आज भी वह शिखर न मिल पा रहा है जिस की अपेक्षा में उस ने हिन्दी के दावेदारों का दरवाज़ा खटखटाया था। अब इतना ही कहा जा सकता है हिन्दी को कुछ तो सुलभ हो सका और इस हिन्दी में लिखने वाले उसे अपनी रचनाओं का अर्घ्य समर्पित कर सके। फिलहाल इसी पर हमें संतोष करना पड़ता है। दो संस्थाओं का जिक्र करना यहाँ मैं आवश्यक मान रहा हूँ। वे दोनों संस्थाएँ हैं मॉरिशस आर्य सभा और हिन्दी प्रचारिणी सभा। आर्य सभा ने ‘धर्म को बचाओ’ और ‘हिन्दी को विस्तार दो’ जैसी भावनाओं से एक शती का सफ़र अब तक इस देश में पूरा कर लिया है। हिन्दी प्रचारिणी सभा ने विशेष रूप से व्याकरण सम्मत हिन्दी पर ज़ोर दिया और इसी पर टिक कर उस ने मॉरिशस को सिखाया कैसे शुद्ध हिन्दी को थामा जा सकता है। यहीं से हम सब को प्रेमचंदप्रसादनिराला महादेवी वर्मा आदि हिन्दी के मूर्द्धन्य साहित्यकारों को जानने और पढ़ने का अवसर मिला।
गोवर्धन यादव- लघुकथाओं से लेकर कहानीलेख-आलेख तथा उपन्यास तक आपका सारा लेखन हिन्दी में हुआ है. हिन्दी लेखन से आपका जुड़ाव कब और कैसे हुआ ?
धुरंधर जी --यह तो तय है जिस ने भी इस देश में हिन्दी के लेखक के रूप में अपनी पहचान बनाने की कोशिश की है उस के लिए भारत के हिन्दी  के रचनाकार अपने आदर्श रहे हैं। ज़रूरी नहीं सब एक ही लेखक का नाम लें। अभिमन्यु अनत और मैंने महात्मा गांधी संस्थान में पचीस साल एक साथ काम किया। हमारा एक और मित्र था जिस का नाम पूजानन्द नेमा था। वह गजब का कवि और चिंतक था। रोज़ हम तीनों घंटों साहित्यिक चर्चा करते थे। अभिमन्यु एक ही भारतीय लेखक से अपने को प्रभावित बताते थे वे थे शरतचंद चटोपाध्याय। मैंने प्रेमचंद को अधिकाधिक पसंद किया। पूजानन्द नेमा के लिए निराला आदर्श कवि थे। मॉरिशस के प्राथमिक कवियों में ब्रजेन्द्र कुमार भगत हुए जिन्हें हमारे देश के स्थापित कवि के रूप स्वीकारा जाता है। वे मैथिलीशरण गुप्त से प्रभावित थे। वे मैथिलीशरण गुप्त की ही तरह कविता रचने का प्रयास करते थे। इस तरह मॉरिशस में शुरुआती कवियों और कहानीकारों के अपने - अपने आदर्श होने से वे प्राय: उन्हीं की तरह लिखने की कोशिश करते रहेलेकिन कालांतर में सोच और अभिव्यक्ति में सब को स्वयं की ज़मीन तो तलाशनी ही थी। अभिमन्यु अनत ने मॉरिशस की मिट्टी का बेटा बन कर वही लिखा जिस में उस की अपनी मिट्टी की सुगंध हो। इसी तरह पूजानन्द नेमासूर्यदेव सिबरत,  सोमदत्त बखोरीदीपचंद बिहारीभानुमती नागदान और स्वयं मैं हम सभी अपनी - अपनी रचनाओं में अपने - अपने नज़रिये से अपने देश को आँकते रहे।  
गोवर्धन यादव - अच्छी हिन्दी सीख लेने के बाद आपने भी अपनी ओर से हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास किया होगाइस पर कुछ प्रकाश डालने की कृपा करें?
धुरंधर जी - मैंने प्रयास अवश्य बहुत किया है। मैं स्थानीय रेडियो में दस साल हर सप्ताह तीन साहित्यिक कार्यक्रम प्रस्तुत करता था। इस में एक रेडियो नाटक होता था। मैं एकांकी लिख कर कलाकारों के साथ रेडियो से प्रसारित करता था। मैं समझता हूँ हिन्दी को निखार  देने में मेरा यह श्रम समुचित था। मैं 1972 - 1980 के वर्षों में हर शनिवार और रविवार की सुबह से दो बजे तक एक कालेज में एक कमरा ले कर वयस्कों को हिन्दी पढ़ाता था। मेरे विद्यार्थियों में पचास की उम्र तक के लोग होते थे और मैं पढ़ाने वाला चालीस के आस पास की उम्र में जीवन की साँसें लेता था। ये लोग हिन्दी सरकारी स्कूलों में शिक्षक थे। मेरा विज्ञापन इस रूप में हो गया था कि मैं व्याकरण पढ़ाने में मास्टर हुआ करता हूँ। यह सही था मैं शुद्ध हिन्दी पर बल देता था और मेरे साथ पढ़ने वालों को लगता था मेरे साथ पढ़ें तो हिन्दी ठीक से जान लेंगे। मैं व्याकरण के लिए काली श्यामपट को उजली खड़ी से रंग कर मिटाया करता था। लगे हाथ मेरा ध्यान इस बात पर रहता था इन लोगों को परीक्षा में सफल करवाना है। जयशंकर की कविता पढ़ाना चाहे मेरे लिए दुरुह होता थालेकिन तैयारी करने पर निश्चित ही वह मेरे लिए सहज हो जाता था। एक बात मेरे लिए बहुत ही अच्छी होती थी मैं स्वयं सीखता भी था। छंद पढ़ाएँ तो मात्रा की समझ से संपृक्त कैसे न होंगे। मैं एक उद्देश्य से अपने उस अतीत की चर्चा कर रहा हूँ। मेरा विशेष तात्पर्य यह है मैं अपने वयस्क विद्यार्थियों में लिखने का भाव अंकुरित करने का प्रयास करता था। हर महीने के अंतिम सप्ताह को मैं आधा दिन लेखन को समर्पित करता था। मेरे विद्यार्थियों में से बहुतों ने बाद में कुछ न कुछ लिखा। मैं महात्मा गांधी संस्थान में प्रकाशन विभाग से जब से जुड़ा लेखक - कवि तैयार करने में मेरा ध्यान बराबर लगा रहता था। किसी किसी की तो आधी कहानी को मैंने लिख कर पूरा किया और बिना अपना जिक्र किये उन्हीं के नाम से छापा। लोग कविता ले कर मेरे घर आते थे। मैं संशोधन करने के साथ यह कहते उन का मनोबल बढ़ाता था अच्छी कविता की तुम में पूरी संभावना है। मैंने भारत में प्रकाशकों से बात कर के दो चार लोगों की पुस्तकें भी छपवायी हैं। अब साहित्यकार के रूप में मेरी पहचान बनते जाने से लोग मेरे साथ जुड़ने के लिए और भी तत्पर रहते हैं। बल्कि मैं भी उन की और दृष्टि उठाये रखता हूँ। हम सब की कामना एक ही होती है हमारे देश में हिन्दी का अपना एक दमदार साहित्य हो।

  ……क्रमश:

मंगलवार, 20 मार्च 2018

विस्थापन का दर्द आज भी सालता है : साक्षात्कार




             बाएं से श्री रामदेव धुरंधर जी दाएं गोवर्धन यादव

     मारीशस के प्रख्यात साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी को श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफ़को साहित्य सम्मान जिसमें उन्हें ग्यारह लाख  रुपये एवं प्रश्स्ति पत्र देकर 31 जनवरी 2018 को दिल्ली में सम्मानित किया गया।
उनका साक्षात्कार इंटरनेट के माध्यम से लिया है गोवर्धन यादव ने । प्रस्तुत है साक्षात्कार की कड़ियां ……क्रमश:

गोवर्धन यादव - लगभग देढ़-दो सौ साल पहले बिहार से कुछ लोगों को बतौर ठेके पर/मजदूर बनाकर मॉरिशस लाया गया था संभवतः आपकी यह चौथी अथवा पांचवीं पीढी होगी क्या विस्थापन का दर्द आज भी आपको सालता है?

धुरंधर जी - भारतीय मज़दूरों का पहला जत्था सन् 1834 में मॉरिशस लाया गया था। मेरे पिता का जन्म - वर्ष 189था। प्रथम भारतीयों का मॉरिशस आगमन [1834] और मेरे पिता के जन्म के बीच 63 सालों का फासला है। तब भी भारत से लोगों को इस देश में लाया जाना ज़ारी था। इस दृष्टि से मेरे पिता मेरे लिए इतिहास के सबल साक्षी थे। भारतीयों को लाकर गोरों की ज़मींदारी के झोंपड़ीनुमा घरों में बसाया जाता था। तब भारतीयों के दो वर्ग हो जाते थे। एक वर्ग के लोग वे होते थे जिन्हें जहाज़ से उतरने पर गोरों की ओर से बनाये गये झोंपड़ीनुमा घरों में रखा जाता था। वे गोरों के बंधुआ जैसे मज़दूर होते थे। दूसरे वर्ग के लोग वे हुए जो भारत से सब के साथ जहाज़ में आते थे, लेकिन काट - छाँट जैसी नीति में पगे होने से वे गोरों के खेमे में चले जाते थे। वे सरदार और पहरेदार बन कर अपने ही लोगों पर कोडों की मार बरसाते थे। 
विस्थापन का दर्द तो उन अतीत जीवियों का हुआ जो इस के भुक्तभोगी थे। मैं उन लोगों के विस्थापन वाले इतिहास से बहुत दूर पड़ जाता हूँ। परंतु मैं पीढ़ियों की इस दूरी का खंडन भी कर रहा हूँ। कहने का मेरा तात्पर्य है उन लोगों का विस्थापन मेरे अंतस में अपनी तरह से एक कोना जमाये बैठा होता है और मैं उसे बड़े प्यार से संजोये रखता हूँ। इसी बात पर मेरा मनोबल यह बनता है कि मैं भारतीयों के विस्थापन को मानसिक स्तर पर जीता आया हूँ। यहीं नहींबल्कि मैं तो कहूँ अपने छुटपन में मैं अपने छोटे पाँवों से इतिहास की गलियों में बहुत दूर तक चला भी था।

गोवर्धन यादव कहावत है कि धरती से एक पौधे को उखाड़ कर दूसरी जगह लगाया जाता है तो उसे पनपने में काफ़ी समय लगता है / कभी पनप भी नहीं पाता शायद यही स्थिति आदमी के साथ भी होती है कि उसे विस्थापन का असह्य दर्द झेलना पडता है और अनेक कठिनाइयों / अवरोधों के बाद वह सामान्य जिंदगी जी पाता है उन तमाम लोगो के पास वह कौनसा साधन था कि वे अपने को जिंदा रख पाए और अपनी अस्मिता बचाए रख सके?

धुरंधर जी - जहाज़ में तमाम उत्पीड़न झेलते ये लोग मॉरिशस पहुँचे थे। अपना जन्म देश पीछे छूट जाने का दर्द इन के सीने में सदा के लिए रह गया था। इस देश में आने पर सब से पहले इन की महत्त्वाकाक्षाएँ ध्वस्त हुई थीं इसलिए विस्थापन इन्हें बहुत सालता रहा होगा। बहुत से लोग तो बंदरगाह में डाँट - फटकार और तमाम शोषण जैसी प्रवृत्तियों से टूट कर रोने लगते थे और उन के ओठों पर एक ही चीत्कार होता था मुझे मेरे देश वापस भेज दिया जाए। यह मान्यता अब भी मॉरिशस में पुख्त ही चलती आई है कि भारतीयों को इस ठगी से लाया गया था वहाँ पत्थर उलाटने पर सोना पाओगे। उन लोगों की महत्त्वाकाक्षाओं में से यह एक रही होलेकिन इस का विखंडन तो तभी शुरु हो गया होगा जब वे जहाज़ में सवार होने पर अत्याचार से चिथड़े हो रहे होंगे। ओछी मानसिकता के बंधन में यहाँ आने पर कौन याद रखता। क्या - क्या पाने इस देश में आए थे। बल्कि जो मन का संस्कार थाइज्ज़त आबरू का अपना जो अपार पारिवारिक वैभव था सब दाव पर ही तो लगते चले गए थे। तब तो दर्द यहाँ ज्यों - ज्यों गहराता होगा विस्थापन की आह प्रश्न बन कर ओठों पर छा जाती होगी --अपनी मातृभूमि छोड़ने की मूर्खता भरी अक्ल किस स्रोत से आई होगी?
भारत से विस्थापित लोगों का 1834 के आस पास मॉरिशस आगमन शुरु जब हुआ था तब उन में ऐसे लोग तो निश्चित ही थे जो भारतीय वांङ्मय के अच्छे जानकार थे। उन्हीं लोगों ने तुलसी मीरा कबीर तथा अन्यान्य कवियों की कृतियों का यहाँ प्रचार किया था। शादी के गीतभक्ति काव्य और इस तरह से भारतीय कृतियों और संस्कृति का इस देश में विस्तार होता चला गया था। जो साधारण लोग थे उन के अंतस में भी समाने लगा था कि अपने भारत की इतनी सारी धरोहर होने से हम इस देश में अपने को धन्य पा रहे हैं। कालांतर में भोलानाथ नाम के एक सिक्ख सिपाही ने सत्यार्थ प्रकाश ला कर यहाँ के लोगों को उस से परिचित करवाया। इस देश में यथाशीघ्र आर्य समाज की लहर चल पड़ी थी। यह सामाजिक चेतना की कृति थी। इस की आवश्यकता थी और यह सही वक्त पर लोगों को उपलब्ध हुई थी।

गोवर्धन यादव - मॉरिशस गन्ने की खेती के लिए मशहूर रहा है निश्चित ही आपके पिताश्री भी गन्ने के खेतों में काम करते रहे होंगे वे बीते दिनों की तकलीफ़ों के बारे में आपको सुनाते  भी रहे होंगे कि किस तरह से उन्हें पराई धरती पर यातनाएं सहनी पड़ी थी ?

धुरंधर जी - मेरे किशोर काल में मेरे पिता मुझे इस देश में आ कर बसे हुए भारतीयों की वेदनाजनित कहानियाँ सुनाया करते थे। अपने पिता से सुना हुआ भारतीयों का दुख - दर्द मेरी धमनियों में बहुत गहरे उतरता था। यह तो बाद की बात हुई कि मैं लेखक हुआ। परंतु कौन जाने मेरे पिता अप्रत्यक्ष रूप से मुझे लेखन कर्म के लिए तैयार करते थे। वे मेरे लिए अच्छी कलम खरीदते थे। पाटीपुस्तक और पढ़ाई के दूसरे साधनों से मानो वे मुझे माला माल करते थे। मेरे पिता अनपढ़ थेलेकिन उन्हें ज्ञात था सरस्वती नाम की एक देवी है जिस के हाथों में वीणा होती है और उसे विद्या की देवी कहा जाता है। मेरे पिता ने सरस्वती का कैलेंडर दीवार पर टांग कर मुझ से कहा था विद्या प्राप्ति के लिए नित्य उस का वंदन करूँ। वह एक साल के लिए कैलेंडर थालेकिन उसे मूर्ति मान कर हटाया नहीं जाता था। वर्षों बाद हमारा नया घर बनने के बाद ही किसी और रूप में मेरे जीवन में सरस्वती की स्थापना हुई थी।

गोवर्धन यादव - निश्चित ही उनकी उस भयावह स्थिति की कल्पना मात्र से आप भी विचलित हुए होंगे और एक साहित्यकार होने के नाते आपने उस पीडा को अपनी कलम के माध्यम से व्यक्त करने की कोशिश की है?

धुरंधर जी - मैंने बहुत सी विधाओं में लेखन किया है और अपने देश से ले कर अंतरसीमाओं तक मेरी दृष्टि जाती रही है। यहाँ मेरे पूर्वजों के विस्थापन का संदर्भ अपने तमाम प्रश्नों के साथ मेरे साथ जुड़ जाने से मैं अपने उसी लेखन की यहाँ बात करूँगा जो विस्थापन से संबंध रखता है।
           मैंने ‘इतिहास का दर्द’ शीर्षक से एक नाटक  [1976 ] लिखा था जो पूरे देश में साल तक विभिन्न जगहों में मंचित होता रहा था। यह पूर्णत: भारतीयों के विस्थापन पर आधारित था। मेरे लिखे शब्दों को पात्र मंच पर जब बोलते थे मुझे लगता था ये प्रत्यक्षत: वे ही भारतीय विस्थापित लोग हैं जो मॉरिशस आए हैं और आपस में सुख - दुख की बातें करने के साथ इस सोच से गुजर रहे हैं कि मॉरिशस में अपने पाँव जमाने के लिए कौन से उपायों से अपने को आजमाना ज़रूरी होगा।
     अपने लेखन के लिए मैंने भारतीयों का विस्थापन लिया तो यह अपने आप सिद्ध हो जाता है मैंने उन के सुख - दुखआँसूशोषणगरीबीरिश्ते सब के सब लिये। मैंने लिखा भी है मैं आप लोगों के नाम लेने के साथ आप की आत्मा भी ले रहा हूँ। मैं आप को शब्दों का अर्घ्य समर्पित करना चाहता हूँअत: मेरा सहयोगी बन जाइए। उन से इतना लेने में हुआ यह कि मैं भी वही हो गया जो वे लोग होते थे। किसी को आश्चर्य होना नहीं चाहिए अपने देश के इतिहास पर आधारित अपना छ: खंडीय उपन्यास ‘पथरीला सोना लिखने के लिए जब मैं चिंतन प्रक्रिया से गुजर रहा था तब मैं उन नष्टप्राय भित्तियों के पास जा कर बैठता था जिन भित्तियों के कंधों पर भारतीयों के फूस से निर्मित मकान तने होते थे। जैसा कि मैंने ऊपर में कहा ये मकान उन के अपने न हो कर फ्रांसीसी गोरों के होते थे। उन मकानों में वे बंधुआ होते थे। मैंने उन लोगों से बंधुआ जैसे जीवन से ही तारतम्य स्थापित किया और लिखा तो मानो उन्हीं की छाँव में बैठ कर। बात यह भी थी कि भारतीयों के उन मकानों या भित्तियों का मुझे चाहे एक का ही प्रत्यक्षता से दर्शन हुआ होअपनी संवेदना और कल्पना से मैंने उसे बहुत विस्तार दिया है। तभी तो मुझे कहने का हौसला हो पाता है मैंने उसे भावना के स्तर पर जिया है। पर्वत की तराइयों के पास जाने पर मुझे एक आम का पेड़ दिख जाए तो मेरी कल्पना में उतर आता है मेरे पूर्वजों ने अपने संगी साथियों के साथ मिल कर इसे रोपा था। मेरे देश में तमाम नदियाँ बहती हैं जिन्हें मैंने मिला कर मनुआ नदी नाम दिया है। इसी तरह पर्वत यहाँ अनेक होने से मैंने बिंदा पर्वत नाम रख लिया और आज मुझे सभी पर्वत बिंदा पर्वत लगते हैं। मैंने सुना है दुखों से परेशान विस्थापित भारतीयों की त्रासदी ऐसी भी रही थी कि पर्वत के पार भागते वक्त उन के पीछे कुत्ते दौड़ाये जाते थे। कुआँ खोदने के लिए भेजे जाने पर ऊपर से पत्थर लुढ़का कर यहाँ जान तक ली गई हैं। बच्चे खेल रहे हों और कोई गोरा अपनी घोड़ा बग्गी में जा रहा हो तो आफ़त आ जाती थी। यह न पूछा जाता था स्कूल क्यों नहीं जाता। कहा जाता था बड़े हो गए हो तो खेतों में नौकरी करने क्यों नहीं आते हो। पर ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में यह लिखित मिलने की कोई आशा न करे,क्योंकि लिखने की कलम उन दिनों केवल फ्रांसीसी गोरों की होती थी।

गोवर्धन यादव -  भारत छॊडने से पहले लोग अपने साथ धार्मिक ग्रंथों को भी ले गए थे कठिन श्रम करने के बाद वे इन ग्रंथों का पाठ करते और अपने दुखों को कम करने का प्रयास करते थे इस तरह वे अपनी परम्परा और संस्कार को बचा पाए यह वह समय था जब क्रिस्चियन मिशनरी अपने धर्म को फ़ैलाने के लिए प्रयासरत थे निश्चित ही वे इन पर दबाव जरुर बनाते रहे होंगे कि भारतीयता छोड़कर ईसाई बन जाओ

धुरंधर जी - भारतीय मज़दूरों के मॉरिशस आगमन के उन दिनों में यहाँ विशेष रूप से धर्म,संस्कृतिआचरणपूजारामायण गानसंस्कारनीति जैसे बहुमूल्य सिद्धांतों पर विशेष रूप से बल दिया जाता था। उन दिनों की स्थिति को देखते हुए  ऐसा होना हर कोण से आवश्यक था। ऐसा न होता तो मॉरिशस का भारतीय मन डगमगा गया होता और तब अनर्थ की काली स्याही सब के चेहरे पर पुत जाती। इस देश के उस क्रूर इतिहास को आज भी याद रखता जाता है। ईसाईयत के प्रचार के लिए ईसाई वर्ग के लोग भारतीय वंशजों के घर पहुँचते थे और लंबे समय तक द्वार पर खड़े हो कर उन के दिमाग में डालने की कोशिश करते थे आप इतनी आज्ञा तो दें ताकि हम आप के घर में ईसाईयत का पौधा बो कर ही लौटेंगे। आप हमारे लिए इतना करें हमारे दिये हुए मंत्रों से उस पौधे का सींचन करते रहें। फिर एक दिन ऐसा आएगा जब ईसाईयत का वह पौधा बढ़ कर छतनार हो जाएगा तब बड़ी सुविधा के साथ आप के बच्चे उस की छाया में पनाह पाना अपने लिए सौभाग्य मानेंगे। ईसाईयत की उस लहर ने यदि अपनी चाह के अनुरूप हमारे घरों में प्रवेश पा ही लिया होता तो बहुत पहले मॉरिशस में भारतीयता की छवि धूमिल हो गई होती। सौभाग्य कहें कि भारतीय संस्कार लोगों के सिर पर चढ़ कर बोलता था तभी तो लोग बाहरी झाँसे में भ्रमित होने की अपेक्षा अपने संस्कार में और गहरी श्रद्धा से आबद्ध होते जाते थे। निस्सन्देह धार्मिक संस्थाओं ने इस क्षेत्र में बहुत काम किया था। प्रसंगवश यहाँ मुझे कहना पड़ रहा है आज की तरह विच्छृंखल संस्थाएँ न हो कर उस ज़माने की संस्थाएँ अपने लोगों के प्रति समर्पित और भाव प्रवण हुआ करती थीं। सेवा करो और बदले में फल की कामना मत करो। ईश्वर को इस बात के लिए आज हम धन्यवाद तो दें अपनी ही फूट और ईर्ष्या जैसे अनाचार के बावजूद हमारी सांस्कृतिक विरासत निश्चित ही व्यापक अडिग और सर्वमान्य चली आ रही है। विशेष कर धार्मिक कृतियाँ पूजा पाठ और धार्मिक वंदन की गरिमा को उच्चतर बनाने में अपना सहयोग ज्ञापित करने में कोई कमी नहीं छोड़तीं।
 ……क्रमश:

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

दो मकान पीछे : अशोक बाबू माहौर





   मध्य प्रदेश के मुरैना जिला में 10 जनवरी 1985 को जन्में अशोक बाबू माहौर का इधर रचनाकर्म लगातार जारी है। अब तक इनकी रचनाएं रचनाकार,स्वर्गविभा,हिन्दीकुंज,अनहद कृति, पुरवाई, पूर्वाभास साहित्य शिल्पी साहित्य कुंज आदि हिंदी की साहित्यक पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित ई.पत्रिका अनहद कृति की तरफ से विशेष मान्यता सम्मान 2014.2015 से अलंकृति ।

दो मकान पीछे

दो मकान पीछे
घर मेरा
सना मिट्टी से
घास फूस की छत
चबूतरा कच्चा
उस चबूतरे पर
बैठी दादी माँ
सुनाती लोरियाँ मधुर।

खामोश मन पुलकित
झूमता बन ठन
जैसे पा ली खुशियाँ वर्षों पुरानी
आज फिर,
मस्तमौली हवा
स्पर्श कर
देती सुर ताल
बजाती पत्तियाँ पेड़ों की
जैसे सजी हो महफिल 
मेरे दरवाजे पर 
और दादी माँ 
निखार रही हो लोरियाँ धीरे धीरे। 



संपर्क-
ग्राम-कदमन का पुरा,
तहसील-अम्बाह,जिला-मुरैना (मध्य प्रदेश) 476111 
मो-09584414669 
 ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

जब केसरिया-हरे मिलेंगे : डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'



सभी साथियों को होली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है कवि मित्र  डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' का एक गीत
 

जब केसरिया-हरे मिलेंगे
 
रंग भरेंगे पिचकारी में,
प्रेम-दया-सद्भाव के।
दहन करेंगे इस होली में,
भाव सभी टकराव के।

भूख-ग़रीबी, भय-लाचारी,
मिटे भ्रष्टता की बीमारी।
अविचल-अटल तिरंगे नीचे
स्वर्णिम-युग की दावेदारी।

देख रहे सतरंगी सपने,
कम हों दिवस अभाव के!

समरसता के शोषक हैं जो,
हिंसा के उद्घोषक हैं जो।
उनको भी बासंती कर दें,
काले रँग के पोषक हैं जो।

बहुत हुआ अब नहीं सहेंगे,
नारे विष-विलगाव के!

श्वेत रंग से हृदय धुलेंगे,
अपनेपन से भरे मिलेंगे।
विजय-चक्र की गाथा गढ़ते,
जब केसरिया-हरे मिलेंगे।

गाएँगे समवेत सुरों में,
गीत सरस समभाव के!


सम्पर्क:
24/18, राधा नगर, फतेहपुर (उ.प्र.)-212601
वार्तासूत्र : +91 9839942005
ई-मेल : doctor_shailesh@rediffmail.com

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

सन्तोष कुमार तिवारी की कविताएं -




     

      फिलहाल सो रहा था ईश्वर एवं अपने अपने दण्डकारण्य काव्य संग्रहों से चर्चा में आए युवाकवि सन्तोष कुमार तिवारी कविता को जनता की जुबान में कहने के आग्रही हैं । वे सहज- सरल वाणी में जन जन के दिल की बात की पैरोकारी करते भी दिखते हैं । आप रामनगर, नैनीताल में रहते तथा अध्यापन से जुड़े हैं ।
1-तुमसे मिलूँगा...

तुमसे मिलूँगा तो
लौटते वक्त
पूरा नहीं लौटूँगा
थोड़ा तुम्हारे पास रह जाऊँगा|

थोड़ी बातें
हँसी थोड़ी
रह जायेंगी साथ |

थोड़ी आधी- अधूरी
रह गयीं तुम भी
मेरे वापिस लौटने पर |

2-जैसे देवालयों में नैवेद्य

पास इतने पास
जैसे काजल आँखों के
लहरें सागर
दीपक लौ, और
घटाएं बादलों के पास हैं |

जैसे हरियाली पौधों के
भौंरे फूलों
मछली पानी,और
इन्द्रधनुष अम्बर के |

कोई पास है इतना
जितना
शब्दों के पास ध्वनियाँ
देवालयों में नैवेद्य
गीतों में लय, और
बस्ते में टिफिनबॉक्स होता है |

3 -फिर सवेरा
फिर सवेरा
फिर सवेरा
फिर सवेरा|

छोड़ बसेरा
छोड़ बसेरा
छोड़ बसेरा|

कर बखेड़ा
कर बखेड़ा
कर बखेड़ा |

4-ये कोई कविता नहीं है


नये साल के संदेशों, शुभकामनाओं में
आभाषी दुनिया से बाहर
शामिल किया उन्हें भी
जिनसे रोज का वास्ता है
जिनको छोड़ना कतई ठीक नहीं
कॉलोनी मे तमाम जन
पीरूमदारा के सब्जीवाले
बाल काटने वाले सुलेमान
कंप्यूटर सेंटर के राहुल भाई
फलवाले, मोमफली वाले
साईकिल रिपेयरर , समोसा जलेबी वाले
प्रेम भाई किताब वाले,
फोटोस्टेट वाले,
लाला जी |

ये सब मेरी छोटी सी दुनिया के
वे लोग हैं
जो हर रोज
मुस्कुराते हुए मिलते हैं

मेरे मालिक, इन सबको
खुश रखना |
5-थाह लेना मन की

कब से न जाने
अनछुआ
अनचीन्हा
एकाकी है स्त्री-मन |

यहाँ कब दस्तक दोगे पुरुष?

स्त्री-देह में उतरने से
बिल्कुल जुदा है
स्त्री- मन में उतरना |

कभी उतरना
थाह लेना कभी|


मोबा0-0941175081

रविवार, 11 फ़रवरी 2018

विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र' की ग़ज़ल





काग़ज की कश्ती तैराने का मन करता है
आज फिर बर्षात में नहाने का मन करता है।
 
क्यूँ लगने लगा गंदा राह का पानी मुझको,
वो बचपना फिर से जगाने का मन करता है।
 
क्या कहेंगे लोग मत कर परवाह उसकी
बर्षात में फिर से गाँव जाने का मन करता है।
 
वो समय फिर से ना आ सकता है दुबारा
बार-बार फिर क्यूँ दोहराने का मन करता है।
 
ढूँढ़ने लगी हैं आँखें अब बचपन के मित्र सारे
फिर से वो मज़मा जमाने का मन करता है।
 
ये उम्र है कि व्यग्र हर पल बदलती रही सदा
निकल गयी उसे क्यूँ बुलाने का मन करता है।

  




संपर्क-  
   विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'
   कर्मचारी कॉलोनी,गंगापुर सिटी,
   स.मा. (राज.)322201
   मोबा0- 09549165579
   मेल - vishwambharvyagra@gmail.com

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

माधव महेश की कविताएं -



       

      समकालीन कविता के परिदृश्य में सैकड़ों नाम आवाजाही कर रहे हैं। वरिष्ठ पीढ़ी के बाद युवा पीढ़ी भी काफी हद तक साहित्यिक यात्रा के कई पड़ाव पार कर चुकी है। इनके एक दम पीछे युवतर एवं नवोदित कवि पीढ़ी समकालीन कविता की मशाल उठाए युवा पीढ़ी के दहलीज पर खड़ी है। यथार्थ के धरातल से लेकर मायावी दुनिया के अंतर्जाल में कई दर्जन  युवतर एवं नवोदित कवि समकालीन कविता का झण्डा उठाए आगे बढ़ रहे हैं।       
       फिर भी सन 20000 के बाद एक नवीन किन्तु जुझारू जज्बातों से लबरेज किन्तु-परन्तु से बाहर  युवतर एवं नवोदित कवियों ने हिन्दी साहित्य के आकाश में नयी इबारत लिखी है। वो अलग बात है कि कुछ कम लिखकर ज्यादा चर्चित तो कुछ ज्यादा लिखकर भी कम अथवा अचर्चित ही बने रहे। हिन्दी कविता के मंच पर कौन आएगा और कौन नहीं आएगा इसका निर्णय साहित्य के रेवटी में बैठे तथाकथित कुछ आलोचक गण ही करते रहे हैं।

      माधव महेश की कविताएं जिन मुद्दों को उठाती हैं उनसे आम जनता रोज रूबरू होती है लेकिन उसका हल कौन निकालेगा कैसे निकलेगा यह एक बड़ा प्रश्न है। जनता तो जनता है। आज पढ़ते हैं युवा कवि माधव महेश की कविताएं -


1-
एक दिन
कोई कट्टरपंथी गिरोह
कत्ल कर 
फेंक देगा मेरी लाश 
सड़क किनारे 

तब कुछ 
कट्टरता के विरोधी 
खड़े होंगे 
मेरे कत्ल के खिलाफ
निकाल रहे होंगे जुलूस
उठा रहे होंगे सवाल मेरे कत्ल पर

हाँ ठीक तभी 
मेरे कुछ मित्र
उड़ा रहे होंगे मेरा मजाक
बता रहे होंगे मुझे देशद्रोही
लगा रहे होंगे ठहाके 
नास्तिक कहकर
2-
कब्र अपनी हम ही खोदेंगे
मनुष्य होने के नाते
ये हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है

इसी में दफन कर देंगे
अपने पितरों को 
अपने नाती पोतों को

चूँकि हम इंसान हैं
हम ही मुखाग्नि देंगे 
अपनी चिता को
जिसमें समाहित होंगे
हमारे अतीत की स्मृतियाँ
और भविष्य की झलकियाँ

हम गंगा में विसर्जित कर देंगे
अपनी ही लाश 
जिसके साथ बह जाएगी
पूरी पृथ्वी
इसी में समा जाएंगे
चाँद , तारे और आकाश ।

3-
समय के साथ 
तुम्हारे चेहरे पर
उतर आयी हैं जीवन की पगडण्डियाँ 

तुम्हारे थीसिस के पन्नों का भार
दीखता है तुम्हारे चश्मे में
और उसके पीछे 
तुम्हारी आँखों से झांकता नीला आसमान
ऊँचा है या गहरा 
थहाते हुए बैठा हूँ 
मैं चुपचाप !

तुम्हारे चेहरे से झाँकता हुआ 
मासूम बच्चा 
सयाना दीखता है अब
हर बात पर खिलखिलाता नहीं
मुस्कुराता भर है 
  
कितना कुछ बदल गया 
कुछ ही दिनों में
हाँ पर तुम्हारे चेहरे में 
नमक पहले जैसा ही है
और नहीं बदला है
तुम्हारे गले में पड़ा लाल धागा
जिसने मेरे मन को बाँधे रखा है।
संपर्क सूत्र-

मोबा0-7398984765

बुधवार, 17 जनवरी 2018

समकालीन परिदृश्य की कहानियाँ : रामप्रसाद राजभर

   समीक्ष्य पुस्तक - काफिल का कुत्ता
 
            चर्चित युवा कहानी कार विक्रम सिंह का यह तीसरा कहानी संग्रह है।इससे पूर्व दो कहानी-संग्रह क्रमशः वारिस(2013)और और कितने टुकड़े’(2015) में आये और अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। विक्रम सिंह की कहानियाँ हमारे समाज व समय की सच्चाई को दर्शाती है। संग्रह की पहली कहानी है अपना खून’!पहाड़ व पहाड़ी-जीवन,परिवेश व वहाँ की समस्याओं को लेकर बुनी हुयी एक बेहतरीन कहानी को बड़े परिश्रम से लिखा है लेखक विक्रम  सिंह ने!कहानी शुरू होती है और कहानीकार उपस्थित रहता है पूरी कहानी में!कहानी पढ़ते जाते हैं ,आँखे शब्द-दर-शब्द पढ़ती जाती है और दीमाग में दृश्य बनते जाते हैं!कहानी में इतिहास का समावेश भी कहानी की आवश्यकता के साथ वर्णित है और हमें हमारे बीते वक़्त की याद को हरा कर जाते हैं!    
              
कहानी के शुरूआत में उत्तराखंड़ राज्य के संघर्ष व पहाड़ो में ब्रिटिश के आगमन-गमन के ब्यौरे हैं,जो लेखक की इतिहास की रूची का उदाहरण हैं और कहानी की नीव भी!!ग्रामीण-जीवन छोटी बातों में ही जीवन को उत्सवमय बना लेते हैं!पहाड़ी परिवेश की असुविधा में अध्यापक,डॉक्टर या अन्य सरकारी सेवक जो जनता के लिये नियुक्त होते है,पर अपनी असुविधा को देखकर पलायन कर जाते हैं और पीछे वो जनता रह जाती है जो अभाव में जीने की आदी है!पोस्टमैन हरेक जगह के भ्रष्ट हैं!डाक की पूरी सामग्री हाथतक पहुंचाना कर्म है उनका पर उसके लिये नज़राना चाहिये होता है,कहानी में यह भी अनायास समझ में आता है,जब एक चिट्ठी के लिये दो रूपये ले लेता है पोस्टमैन इंदर से! 

                            कहानी में जो एक और तथ्य है वह ये कि ,'प्राकृतिक खनिज व अन्य सम्पदा से परिपूर्ण जितने राज्य हैं वहां निर्धनता का स्थायी वास है,धन-सम्पदा का दोहन तो सरकारी नीतियों से लाभ लेनेवाले पूंजीपति उठा ले जाते है!इसलिये वहाँ की गरीब युवापीढ़ी अपने सपनों की होली जलाकर काम व धनोपार्जन के लिये दूर-दराज के क्षेत्रों में चले जाते हैं,जहाँ वे हाड़तोड़ परिश्रम करते हैं और मुआवजे के ऐवज में इतना ही पा पाते हैं कि,'मैं भी भूखा न रहूं,परिवार न भूखा सोय!'साधू के लिये कुछ नहीं बच पाता!आगे जो कहानी है वह शीर्षक के हिसाब से है!आज के समाज में भी लोगों को संतान और वह भी पुत्र की इच्छा प्रबलता से घेरे हुये है!और इसी चाह में नायिका फंसती है और कहानी भावपूर्ण होती जाती है!कहानी में दो जगह लेखक का विद्रोही स्वर मुखर होता है!!

"मेरे हुलिये पर हंस पड़ा था कोई,रो दिया मेरी शायरी सुनकर!''                   
संग्रह की दूसरी कहानी शीर्षक कहानी है काफिल का कुत्ता । फैज अहमद फैज साहब के बेहतरीन शेर के साथ कहानी की शुरुआत होती है।कहानी की शुरुआत एक कॉलोनी से होती है। जैसा कि अमूमन होता है, किसी भी नई बस्ती में कुत्तों की संख्या अधिक होती है; वह भी आवारा कुत्तों की।  कहानीकार कुत्तों और मनुष्य का तुलनात्मक अध्ययन कर पाता है कि,’ मनुष्य भी वास्तव में कुत्ता ही है जो धनिक नामक बड़े कुत्ते की गुलामी करने को विवश है।व्यंग्यात्मक संस्मरण की तरह कहानी आरंभ होती है।जिस अनुपात में पिल्ले खत्म हुए थे उस अनुपात में हम सब जिंदा थे कुत्ते की भूमिका बस सहवास  तक ही थी उसका पालने से कोई मतलब नहीं था।दो दशक पहले की बस्तियां कैसी थी? वहां क्या-क्या हलचलें हो रही थी? इन सब का बहुत सुंदर चित्रण कहानीकार ने किया है। वास्तव में किसी कहानी का सूत्रधार स्वयं कहानी कार होता है।ठीक वैसे ही इस कहानी में भी सूत्रधार के रूप में कहानीकार मौजूद है। जो समय-समय पर अपनी मौजूदगी को दर्शाते जाते हैं जिससे कहानी की विश्वसनीयता बढ़ती है। एक समय के पश्चात बचपन समाप्त हो जाता है। किशोरावस्था का अवसान हो जाता है।और रोजगार की समस्या हमारे सामने सुरसा के मुंह की तरह बाए खड़ी मिलती है।तब हमें पता चलता है वास्तविक दुनिया का।तब युवाओं को घर छोड़कर अन्यत्र जाना पड़ता है रोजगार के लिए:- कुत्तों के पिल्लों की तरह कॉलोनी से लड़के खाली हो रहे थे।... हां वह मर नहीं रहे थे मर मर के जी रहे थे।कहानी में प्रेम प्रसंग भी यथा समय आता है पर वह गौण है। हमारी शिक्षा व्यवस्था रोजगार के अवसर प्रदान नहीं करती है।     
       आज के युवा बेहतर आजीविका की तलाश में खाड़ी देशों की ओर पलायन करते हैं। उन्हें वहां प्रकाश जवान दिखता है।यहां से  वहां जाकर वे वहां के घनीभूत अंधेरों में फँस जाते हैं। वहां जाकर वहां के शोषक मालिकों की गिरफ्त में फंसकर उनका पूरा जीवन नष्ट हो जाता है। अक्सर हम जीवन में जो देखते हैं वह दृश्य वैसे ही नहीं होते। मृगमरीचिका का भ्रम अक्सर रेत के विशाल मरुस्थल में ही होता है। एक मोटी रकम की व्यवस्था के पश्चात विदेश जाने की जुग तंत्र की है। कहानी खाड़ी देश में गए कामगरो के दुखद व कष्टमय जीवन का सटीक  बयान है।बड़ा कर्ज लेकर कमाने गये युवकों  की विवशता उस कर्जषको चुकाने की भी होती है। और वहाँ की कानून-व्यवस्था भी उन्हीं के विरोध में होती है सो चाहकर भी वे कुछ नहीं कर पाते। खाड़ी देश में काम करने गया युवा वास्तव में वहां के धनीको का कुत्ता बनकर रह जाता है।
 
दरे गैर पर भीख मांगों न फन की।
जब अपने ही घर में खजाने बहुत हैं। नौशाद
 
                      सच कितने धारदार है उनसे न पूछिये:-गोरख पाण्डेय संग्रह की अगली कहानी बद्दू है। कहानी का आगाज अदम  साहब के शानदार शेर से होती है कहानी वे किसानी और काम गरी के साथ-साथ अन्य विषयों व कथा वस्तु का समावेश हुआ   2 पीढ़ियों के अंतराल में समाई कहानी कई महत्वपूर्ण सवालों से जूझती है। और समाधान भी प्रस्तुत करती है ।पलटन व तारकेश्वर गांव से कोयला खदान की ओर काम की तलाश में जाते हैं तारकेश्वर वही जम जाता है और पलटन गांव वापस आ जाता है।कालांतर में  परिस्थितियां ऐसी हो जाती है कि नौकरी वालों की तनख्वाह में  आशातीत  बढ़ोतरी होती है अन्य सुख-सुविधाओं के साथ। जिससे वे मालामाल हो  जाते हैं और खेती करने वाले किसान निर्धनता की अतल गहराईयों की ओर सरकते जाते हैं।  परिस्थितियाँ  पलटती जाती हैं समय के साथ।पलटन अपनी भूमि तारकेश्वर को बेचता है। इस कहानी में भी शिक्षा व्यवस्था व उसका रोजगार उन्मुख न होने के कारण फैली बेरोजगारी की विशाल समस्या पर प्रकाश स्वतः पड़ता है ।जब नौकरी काम करने वालों को ही मिलती है तो क्यों सरकार फालतू का BA,B.Com पढा रही है। जमाना अब इतिहास भूगोल का नहीं रह गया है।पृष्ठ-84
                
    पलटन को अपनी जमीन बेचनी पड़ती है क्योंकि वह अपने बेटे धनंजय को खाड़ी देशों में काम के लिए भेजना चाहता है पर उसे जमाने की चालबाजियों  और हकीकत का पता नहीं होता पूरी तैयारी के साथ पलटन अपने बेटे धनंजय के साथ मुंबई इंटरव्यू के लिए पहुंचाता है इस विशालकाय  समुद्र में कई लोग विदेश जाने के लिए गोता लगा रहे हैं बड़ी बड़ी शार्क व व्हेल जैसी मछलियां निगलने के  लिए तैयार थी।पृष्ठ-85
                  
    आखिर यही सत्य है। विदेश में जाकर काम करने को उत्सुक वॉव को युवाओं को अपने ही देश में रोजगार की संभावनाओं को स्वयं ही पैदा करना होगा धनंजय वहां जाकर फँस तो जाता है पर देव कृपा से वह वापस आने में कामयाब हो जाता है।कई ऊहापोहो से गुजरती कहानी को समाधान मिल जाता है कि,’सही दिशा में परिश्रम कर रोजगार व धन दोनों को प्राप्त किया जा सकता है।                      
     संग्रह की चौथी कहानी आवारा अदाकारहै।कहानी कस्बे का और दो दशक पूर्व के कस्बाई जीवन का जीवन्त चित्रण है। प्रेम और वह भी निश्छल हो तो सार्थकता की सीमा के पार तक जाता है। पर परिणाम तक नहीं पहुँच पाता।गुरूवंश ऐसे ही अपने प्यार को पाने के लिये जीवन और समाज के महासागर में गोते लगाता है पर बहुत प्रयास के पश्चात भी सफल नहीं हो पाता और सिनेमा की चकाचौंध से भरी दुनियाँ में अटक जाता है सुखमय भविष्य की कल्पना लिये।कहानी में पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं की मनःस्थिति को बाखूबी शब्द-रूप दिया है लेखक ने।इस कहानी में  पुरानी कहावत चरितार्थ होती है,’पढ़े फारसी बेचे तेल।देखो भाई करम के खेल।।गुरूवंश के रूप में  लेखक ने एक ऐसा चरित्र गढ़ा है जो तमाम योग्यताओं के बावजूद निम्न से निम्न कार्य करने में  संकोच नहीं करता।इससे यह संदेश भी प्राप्त होता है कि मात्र पढ़कर ही रोजगार के अवसर के भरोसे नहीं रहना चाहिए अपितु अवसरों का स्वयं निर्माण करना चाहिए।प्रयास सतत् करते रहना चाहिये,सफलता-असफलता के परिणाम को परे धकेलकर।कस्बे व महानगरीय दृश्यों का सटीक बयान भी है। अभिनय की रंगीन व चकाचौंध दुनियाँ में कई हीरे अपनी चमक पूरी बिखेर नहीं पाते,ऐसे ही अनाम और गुमनाम कलाकारों की श्रेष्ठ कहानी है। 
                   
   अंतिम कहानी रास्ता किधर है में कहानीकार उस दुविधा का हल खोजने की कोशिश मे है कि ग्रामीण जीवन और शहरी जीवन में  विवाह की कौन सी रीति सफल है?  
              
    हम जिन कामों में  खुश होते हैं उन्ही कामों पर अपने बच्चों पर पाबंदी लगा देते हैं।जैसा कि इस कहानी में  भी है।बाप एक ब्याहता पत्नी की मौजूदगी के बावजूद दूसरी स्त्री से तमाम सम्बन्ध कायम रखता है पर अपनी पुत्री पर प्यारन करने की पाबंदी। जिस घर में लड़की होती है उस घर के माँ-बाप की जिम्मेदारी में ओवरटाइम का समय मुफ्त में जुड़ जाता है।इसी चिन्ता के साथ कहानी आरम्भ होती है। पंजाब की पृष्ठभूमि पर आधारित है कहानी सो नशा अनिवार्य है,एक समस्या के रूप में।पर यदि माँ-बात व नजदीकी रिश्तेदार चौकन्ने हो तो इस समस्या को नेस्तनाबूत किया जा सकता है।
                 
     महिलाओं के आर्थिक रूप से समृद्ध होने की थीम को लेकर बुनी हुई एक बेहतरीन कहानी से रूबरू होते हैं हम,’अभी तुम्हारा वक़्त पढने-लिखने का है।तुम्हें अपने पैरों पर खड़ा होना है। .....अगर तुम्हें डबलू से इतना ही प्यार है तो अभी उसे कहो कि वह अच्छी नौकरी की तैयारी करे ताकि शहर में अच्छा घर लेकर तुम्हें अच्छे से रख सके।...तुम भी पढ-लिखकर आत्मनिर्भर बनो क्योंकि पत्नी को हर मोड़ पर अपने पति का हाथ बटाने के लिये आत्मनिर्भर होना बहुत जरूरी है। पृष्ठ-125

                 विक्रम सिंह की कहानियाँ हमारे समाज व समय की सच्चाई को दर्शाती हैऔर कहानीकार के पास जीवन का विस्तृत व गहरा अनुभव है जो इन कहानियों में आया है। साधुवाद विक्रम सिंह को इन कहानियों के लिए।
संपर्क सूत्र- रामप्रसाद राजभर,अल्फा स्टील,अर्नोस नगर,वेलूर साउथ,तृश्शूर-680601,केरल।
  काफिल का कुत्ता-विक्रम सिंह, अमन प्रकाशन,कानपुर। 
फोन नम्बर-9839218516,8090453647, मूल्य ₹150/=