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सोमवार, 28 सितंबर 2015

समीक्षा - नमि मेरी आँखें : गोवर्धन यादव

         



      स्टार पब्लिकेशंन प्रा.लि. से प्रकाशित कविता संग्रह नमि मेरी आँखेंमारीशस के यशस्वी कवि राज हीरामन का यह दसवाँ कविता संग्रह अभी हाल में ही प्रकाशित होकर आया है. इससे पूर्व आपके नौ कविता संग्रह (1) कविताएं जो छप न सकीं (2)छपकर रहीं कविताएं (3) चुभते फ़ूल(4) हंसते कांटॆ (5)अंधेरे का उजाला (6) उजाले का अंधेरा (7) धरती तले अंधेरा (8) एक जमीन आसमान पर (9) नेहा की निधि प्रकाशित हो चुकी हैं. नमि मेरी आँखें. सद्यः प्रकाशित है..


इस कविता संग्रह में कुल 43 कविताएँ प्रकाशित है, जिसमें अधिकांश कविताएं वियोग को लेकर लिखी गई हैं. कवि ने संग्रह को जो शीर्षक दिया है तथा अपने वक्तव्य में इस बात का उल्लेख भी किया है कि ये कविताएं उनकी दिवंगत पत्नि श्रीमती नमि की विरह पीडा में  लिखी गई हैं. उन्हें केन्द्र में रखकर कवि ने अपने जज्बातों को उजागर करने का उपक्रम किया है. जिन्हें मैंने काव्य-भाषा, काव्य-अवधारणा, आदि को लेकर अपने विवेक के आधार पर कुछ वर्गों में बांटने का उपक्रम किया है. यथा-(i)स्वप्न बुनती कविताएँ और उसकी छायाओं को लेकर लिखी गईं कविताएं –आज, आए मौसम जाए मौसम, साथ संग, याद आती हो, रे तकिया, अमरत्व, शांति दूत, तमाम परिवर्तन और उतार-चढाव, तथा पेबंद पे पेबंद

(ii) रागात्मक संबंधों को लेकर बुनी कविताओं में –कर ले श्रृंगार सखी, सपने में आई थीं तुम, कहीं, टूटा पर झुका नहीं. हौले-हौले, अर्सों का प्यार

(iii) वियोग को लेकर कविताओं में-  ख्वाब बुने, साधना, कुछ आंसू, जख्मों पर पैबंद, कितना अच्छा था, सखी कहकर जाती, दर्दे घाव का फ़ूल, के लिए, आ जाओ तुम ,अलविदा, बोलती लाशें, मेरा दर्द, अलग रास्ते

(iv) प्रेम में डूबे मन को लेकर लिखी गईं कविताओं में- मत पूछ. एक गीत गा रहा हूँ. शब्द आदि

( v) बादल को उमडता-धुमडता देखकर लिखी कविताएं- जा रे बारिश, आ रे बादल, बादल बन के आउंगा, रूठकर आया हूँ, बादल घोडा, बारिश की रात

(vi) अन्य में- बिकाऊ है देश, किसमें कितना दम है, दुनिया गोल है, गुरु के दोहे, दिया हूँ मैं, हां मैं दर्द बेचता हूँ, आ रे पंछी, रॊटी और वोट, दिन शाम हुआ, बिम्ब, सूरज जेल में, आँखें, लगा आग पूंछ में, सूरज खोता नहीं, नीलकण्ठ, तथा चाचा रामगुलाम. आदि कविताओं को भी वर्गीकृत किया जा सकता है, विविधताओं से भरे इस संग्रह के लिए लेखक साधुवाद का पात्र है. संग्रह में वर्णित कविताओं को पढते हुए कहा जा सकता है कि-


कवि के भीतर मौजूद व्याग्रता, व्याकुलता और अधीरता के बावजूद भी ध्यान, मनन, चिंतन, धीरता, मंथरता और गंभीरता के साथ उनकी कविता ज्यादा दिखाई देती है. इन कविताओं में प्रेम की मधुर आँच है, प्रणय की उष्मा है, और प्रेम का लौकिक सौंदर्य है, जो देश और दुनियां की सीमाएं स्वीकार नहीं करता. निश्चित ही कहा जा सकता है कि आपका प्रेम असीम और निश्छल रहा है. कवि ने अपने रागात्मक संबंधों को लेकर एक काव्यात्मक दुनिया निर्मित करते हुए अपने दुख-सुख, आशा-निराशा, हर्ष-विषाद, संकल्प-स्मृतियों को अलग-अलग कोणॊं से उल्लेखित किया है. इन कविताओं को पढते हुए यह भी महसूस होता है कि तमाम तरह की ऎन्द्रिकता के बावजूद उनमें नारी के प्रति असीम सम्मान का भाव रहा है.


कवि ने अलक्षित रह जाने वाले प्रसंगों और भावों को पकडने की, एवं अपने आसपास के जीवन और जीवानुभवों में धंसते हुए उन तमाम बिंदुओं को पकडने की भी कोशिश की है. कविताएं तो कई बार डायरी के पन्नों की तरह पर्सनल बातों को उजागर करती प्रतीत होती हैं. पति-पत्नि के संबंधों पर आधारित कविताओं में एक ताप देखा जा सकता है, तो कहीं आलोचनात्मक टीपें भी हैं.


कवि अपने छॊटॆ-छॊटॆ निजी दुखों के बीच रहते हुए काव्य संभावनाओं का सफ़रनामा लिखने में उसका आत्मगत संसार बार-बार व्यक्त होता है. और उसने एक सचेत कवि की तरह अपने समय के सत्य को अपनी आँखों से देखने का और बतलाने का रास्ता चुना.कई छॊटी-छॊटी अन्य रचनाएं भी संग्रह में अपना विशेष स्थान बनाते हुए दर्ज हुई हैं,जिनकी गूंज देर तक मन में बनी रहती है.

संकलन की  कविताएं राज हीरामन के रचनाकार के आत्म का पारदर्शी प्रतिरूप है. छ्ल-छद्म, दिखावेपान और सारी बनावट से दूर, लाभ, लोभ वाली आज की खुदगर्ज दुनिया में, एक सरल, सहज,निष्कुंठ, निर्मल मन से हमारा सादर अभिवादन. 

पुस्तक समीक्षा : नमि मेरी आँखें कवि- राज हीरामन
संपर्क-

103, कावेरी नगर, छिन्दवाडा(म.प्र.) 480001
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 छिन्दवाडा                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                            

सोमवार, 13 जुलाई 2015

पुस्तक समीक्षा-बर्फ़ सी गर्मी

                                  
                            
       इस निर्दयस्त समय में जहाँ स्वार्थ और लोलुपता की आंधी चल रही हो, जहाँ गलाकाट स्पर्धाएं चल रही हों, सिर्फ़ धन बटॊरने के लिए नित नए फ़ंडॆ ईजाद किए जा रहे हों, जहाँ आचार-विचार और परंपराओं की धज्जियां उडाई जा रही हों, जहाँ आदमी के संवेदना-जगत को क्षत-विक्षत करते हुए उसे खण्डहर में तब्दील किया जा रहा हो,जहाँ खुदगर्जी, फ़रेब और औपचारिकता ही आदमी की पहचान बनती जा रही हो, जहाँ आदमी के जीवन के शाश्वत मूल्यों की जमीन लगातार छॊटी होती जा रही हो. शब्द-रूप,रस तथा गंध के संवेदनों, भावभूमि के मूल्यवर्ती अहसासों और क्रिया-कलापॊं से वह लगातार अजनवी बनता जा रहा हो. ऎसे कठिन समय में  राज हीरामन का कथा-संग्रह बर्फ़ सी गर्मी का आना शुभ संकेत तो है ही,साथ ही यह आशा भी बंधती है कि वे विलुप्त होती जा रही मानवता को बचाने के लिए जद्दोजहद करते  देखे जा सकते है. उनकी कहानियों को पढकर राहत मिलती है. वे एक नयी चेतना और ऊर्जा के साथ उन तमाम तरह के मकडजालों को काट फ़ेंकने में समर्थ दिखाई देते हैं. उनकी लेखनी में एक प्रकार की विकलता और छटपटाहट स्पष्ट रूप से दिखाई देती है.

            मारीशस में जन्में कवि-कथाकार से मेरी मुलाकात  उन्हीं के देश मारीशस में हुई थी. आपके अब तक दस कविता संग्रह, तीन कहानी संग्रह, एक साक्षात्कार संग्रह, एक आलेख संग्रह प्रकाशित हुए है. अनेकानेक सम्मानॊ से सम्मानित होने के अलावा आपने चार किताबों का संपादन भी किया है. वर्तमान में आप महात्मा गांधी संस्थान के सृजनात्मक एवं लेखन विभाग में रिमझिम तथा वसंत पत्रिका के वरिष्ठ उप-संपादक हैं

            बर्फ़ सी गर्मी  में दस कहानियां हैं. बर्फ़ सी गर्मी तथा लेट अस ब्रेक कहानियां विदेशी पृष्ठ-भूमि पर लिखी गई कहानियाँ हैं. माँ-दाई-माँ, घर वह बडा, मर गया पर जिंदा था, मानवाधिर, साहिल, प्रेरणा, खेत सुमन के हो गए और धनराज. इन कहानियों  के किरदार, किरदारों की दशा-मनोव्यथा,आदि कहानियों की अपनी जमीन  मारीशस की है. 

            बर्फ़ सी गर्मी शीर्षक चौंकाता है. सहज ही मन में प्रश्नाकुलता पैदा होती है कि भला बर्फ़ में गर्मी कैसे हो सकती है.?. लेकिन जैसे-जैसे आप कहानी के भीतर उतरते हैं, तो पता चल  जाता है कि आखिर वह गर्मी किस प्रकार की थी. 

            उत्तरी व्हेल्स के एक छॊटे से शहर की कहानी है यह. इसमें एक अविवाहित पात्रा है,जिसका नाम मारगारेट है. उसका एक भाई है, जिसका नाम आंद्रे है. वह जानलेवा बीमारी में  ग्रसित एक अस्पताल में भरती है. वह रोज उससे मिलने जाती है. आंद्रे के दो बेटे मारिस और जान रील हैं,जो कुछ ही दूरी पर मानचेस्टर शहर में रहते हैं. पर अपने पिता को न कभी  शामारैल लोल्ड होम केयर में देखने आए और ना ही अस्पताल में. उसकी एक बेटी भी है मारिया. मारिया इसी शहर के दूसरे छॊर पर रहती है,कभी-कभी अपने बाप को देखने और   पूछताछ करने आ जाती है.


            वह दिन भी शीघ्र ही आ जाता है जब आंद्रे की मृत्यु हो जाती है. खबर मिलते ही मोरिस   और जान अपनी-अपनी पत्नियों और दो-दो युवा पुत्रों और पुत्र वधुओं के साथ आ पहुंचते हैं. जैसा कि वहाँ ईसाई धर्म प्रचलित है. उस धर्म के मुताबिक उसकी अंत्येष्टि की जाती है. बनाये गए  गढ्ढे में शव को उतारकर मिट्टी डाली जाती है. मिट्टी तब तक डाली जाती है,जब तक जमीन को समतल नहीं बना दिया जाता. इसके बाद धन्यवाद भाषण देने का रिवाज है. मारगारेट आंग्रे के बेटॊं से दो शब्द अपने पिता के बारे में कहने का आग्रह करती है. लेकिन वे हिम्मत नहीं जुटा  पाते. कहते भी तो क्या कहते? कहने के लिए कुछ भी तो नहीं था दोनो के पास. क्या वे यह कहते कि अपने पिता के जिंदा रहते हुए उन्होंने कभी उसकी परवाह नहीं की और न ही कभी  उससे मिलने आए?

            दोनो को आगे न बढता देख, मारगारेट जान के बेटे आनथनी को आगे करती है. आनथनी विश्वविद्यालय में जेनेटिक इंजिनियरिंग का छात्र था. बोलने में माहिर, निर्भिक, और न हीं किसी प्रकार की कोई झिझक थी उसमें. शब्दों का भण्डार था उसके पास. काफ़ी कुछ कहते  हुए और अंत में सभी के प्रति धन्यवाद देते हुए उसने कहा-एक गया पर सबको इकठ्ठा कर   गया. यही हमारे जीवन की शुरुआत है. अतः मृत्यु के बाद भी जीवन है इसके बाद सभी  बारी-बारी से गले मिलते हैं. मिलने से एक ऊर्जा उत्पन्न होती है और मन पर बरसों-बरस से जमी बर्फ़ पिघल-पिघल  कर आँखों के माध्यम से आँसू बन कर बहने लगती है.

      लेट अस ब्रेक इस कहानी की पृष्ठभूमि इंग्लैण्ड की है. डानियल अरबों-खरबों का मालिक है. पति बदलने में माहिर सुजन उसके जीवन में आती है. पांच साल तक वैवाहिक जीवन बीता चुकने के बाद एक दिन वह डानियल से कहती है=लेट अस ब्रेक.और वह उसे छॊडकर चली जाती है. घर में बरसों से काम कर रही मेरी का अचानक उसके जीवन में प्रवेश हो जाता है. इंगलैण्ड में किस तरह जीवन जिया जाता है, उसको उजागर करती चलती है यह कहानी.

      माँ-दाई-माँ... एक खुद्दार महिला के इर्दगिर्द घूमती कहानी है यह. व्यस्ततम जीवन यापन कर रहे एक वकील,जिसकी पत्नी का देहान्त हो गया है. सारे संस्कारों को निपटा चुकने के बाद जब वकील साहब अपने घर में बरसों से काम कर रही दाई को साडियाँ और पैसे देना चाहते हैं, तो वह दसियों साडियों में से केवल एक साडी और नोटॊं के पुलंदे में से एक नोट निकाल कर यह कहते हुए चल देती है -नहीं साहब ! मैं इस सबके लिए बहुत छॊटी हूँ

      मनोविज्ञानिक तरीके से आगे बढती कहानी मर गया पर जिन्दा था,दुखों से भयाक्रांत हो उठने वाले माला और गुलशन किस तरह से बागी हो उठते हैं मानवाधिकार, रागिनी की कमनीय काया से प्रभावित अभयानंद उसे अपनी कम्पनी में बडॆ-बडॆ अवसर उपलब्ध करवाता है, लेकिन जब वह उसे छॊड देता है, तो सहसा रागिनी किस तरह उसके लिए प्रेरणा बन जाती है अपने नाटकीय अंदाज से बढती कहानी आपको बांधे रखती है. हरिदेव और सुमन के अद्भुत चरित्र को आप कहानीखेत सुमन के हो गए में देख सकते हैं. एक पेन्शनर बाप धनराज खुद भूखों मरने पर विवश है, जबकि उसकी बेटी उसके पैसों पर मजे उडाती है,मार्मिक कहानी बन पडी है. कलम के धनी हीरामनजी ने भाषागत मुहावरों और लोकोक्तियों के माध्यम से कहानियों को प्रभावशाली बनाने में कोई कसर नहीं छॊडी है.

            अंत में मैं धन्यवाद देना चाहता हूँ  इंदौर के डा. राकेश त्रिपाठीजी को, जिन्होंने श्री राज हीरामनजी के अनुरोध पर मुझे यह कहानी संग्रह बर्फ़ सी जमी गर्मी और काव्य संग्रह नमि आँखें मेरीसमीक्षार्थ भिजवाईं.

            मुझे आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि भविष्य में आपके अनेकानेक संग्रह प्रकाशित होंगे. निश्चित ही आपकी साहित्यिक यात्रा मारीशस और भारत को जोडॆ रखने में सेतुकी भूमिका का निर्वहन करेगी.
            एक सार्थक कहानी संग्रह मुझ तक भिजवाने के लिए पुनः आपका हार्दिक आभार.


समीक्ष्य पुस्तक - ‘  बर्फ़ सी गर्मी
लेखक - राज हीरामन                                           
संपर्क -                                     
 गोवर्धन यादव       
 103, कावेरीनगर,छिन्दवाडा(म.प्र.)480001                      
  (संयोजक म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति)                       
  09424356400

शनिवार, 9 मई 2015

साहित्यिक संगोष्ठी के बहाने मारीशस की यात्रा : गोवर्धन यादव



                                                     
हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं उन्नयन के लिए अग्रणीय अभ्युदय बहुउदेशीय संस्था, वर्धा द्वारा लघुभारत कहे जाने वाले मारीशसकी  पांच दिवसीय सदभावना यात्रा (24 मई से 28 मई 2014)  मुबंई के छत्रपति शिवाजी अंतरराष्ट्रीय एअरपोर्ट से शुरु हुई. बावन सदस्यों का एक दल रवाना हुआ जिसमें देश के ख्यातिलब्ध लेखक, कवि, कथाकार, पत्रकार, कलाकार ,संपादक ,प्राध्यापक आदि शामिल थे.
 28  मई 2014 को कोस्टल रोड पर स्थित कोलोडाइन सूर मेर होटल के भव्य सभागार में मारीशस के कला-संस्कृति मंत्री मान.श्री मुखेश्वर चुनीजी, महात्मा गांधी इन्स्टिट्युट की निदेशक डा.श्रीमती व्ही.डी.कुंजलजी,  केन्द्रीय हिंदी सचिवालय के निदेशक मान. डा गंगाधरसिंह सुकलालगुलशन, हिन्दी स्पिकिंग यूनियन के अध्यक्ष श्री राजनारायण गति, महात्मा गांधी इन्स्टि.में हिन्दी भाषा प्रमुख डा.श्रीमती अलका धनपत को, संस्था के अध्यक्ष श्री वैद्यनाथ अय्यर ने सूत की माला पहनाकर भावभीना स्वागत किया.
द्वितीय चरण में साहित्यकार गोवर्धन यादव( संयोजक म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति,जिला इकाई छिन्दवाडा-म.प्र.), समिति सचिव श्री नर्मदाप्रसाद कोरी (छिन्दवाडा-म.प्र), शरद जैन(खण्डवा म.प्र,) संतोष परिहार(बुरहानपुर-म.प्र.), अतुल पाठक(सुरत), डा,वंदना दीक्षित(नागपुर), डा अनंतकुमार नाथ,(तेजपुर), डा.मधुलता व्यास (नागपुर), डा ऊषा श्रीवास्तव(बंगलुरू), डा.मफ़तलाल पटेल(अहमदाबाद), डा.पी.सी.कोकिला(अमरावती), ,डा.वामन गंधारे(अमरावती), डा.शंकर बुंदेले(अमरावती), श्रीमती सुजाता सुर्लकर(मडगांव-गोवा), विकास काले(वर्धा), सुश्री हिना शाहा(अहमदाबाद) एवं पांडूरंग भालशंकर(वर्धा) ने हिंदी से संबंधित विभिन्न विषयों पर आलेख का वाचन किया.
तीसरे चरण में मारीशस के कला एवं संस्कृति मंत्री माननीय श्री मुखेश्वर मुखी द्वारा उपरोक्त सभी साहित्यकारों को सूत की माला पहनाकर स्वराजप्रसाद त्रिवेदी हिन्दी सेवी सरस्वती सम्मान से सम्मानित किया.
कार्यक्रम के चौथे चरण में मारीशस के ख्यातिलब्ध साहित्यकारों- श्री राज हीरामन, रामदेव धुरंधर, प्रल्हाद रामशरण, इंद्रदेव भोलानाथ, श्रीमती उमा बासगीत ,हनुमान दुबे गिरधारी, धनराज शंभु, डा. विनोदबाला अरूण, सूर्यदेव सिबोरत, एवं डा.रशमी रामधोनी को सूत की माला पहनाकर, श्रीफ़ल देकर सम्मानीत किया. इसी श्रृंखला में काव्य-गोष्ठी का भी आयोजन किया गया था, देर रात तक चले इस कार्यक्रम में मारीशस तथा भारत के कवियों ने अपनी उत्कृष्ठ रचनाओं का पाठ किया
काव्यपाठ कर रहे मारीशस के लब्ध प्रतिष्ठित कवियों की रचनाओं में तथाकथित सत्ताधारियों की क्रूरता, अन्याय, शोषण की व्यथा-कथा परिलक्षित होती थी और साथ ही उनके चेहरे पर दिपदिपाता दीखता है भारतीय होने का आत्मगौरव वाला चटकीला-चमकीला रंग.
1967 को देश में हुए आम चुनाव के बाद हुई उदघोषणा के ठीक पच्चीस बरस बाद यानि 12  मार्च 1992  को मारीशस पूर्णरूप से गणराज्य हो पाया था. इन तिथि से पूर्व, गिरमिटिया अथवा बंधुआ मजदूर कहलाए जाने वाले भारतीय, कभी पुर्तगाली, कभी डच कभी फ़्रेंच, तो कभी ब्रिटिश सत्ताओं के दमनचक्र मे पिसते रहे, तो कभी  क्रूरता, अन्याय और शोषण को सहन करते हुए उन्होंने न तो अपना सर झुकाया और न ही अपना निज.खोया और न ही अपना सम्मान. यहाँ तक कि अपने भारतीय होने के गौरव को, न तो कभी झुकने दिया और न ही उस पर आँच आने दी. यह सब इसलिए संभव हो सका क्योंकि वे अपने साथ भारतीय संस्कृति की अमरबेल, भग्वद्गीता, रामायण, रामचरित मानस और, सुखसागर सरीखे पवित्र और अमर ग्रंथों को साथ लेकर जो गए थे.
मानव संसाधन संग्रहालय के निदेशक डा.श्री देव काहुलेकरजी संग्रहालय में उपलब्ध सभी दस्तावेजों और अन्य सामग्रियों को, जिसे वे (मजदूर) अपने साथ लेकर गए थे, पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए, उन तमाम चीजों को बडॆ गौरव के साथ दिखलाते चलते हैं. अपने अतीत को संग्रहीत करना और उस पर  गौरवान्वित होना, आज की इस पीढी से सीखा और समझा जा सकता है. आज उन भारतीयों ने अपने दमखम पर मारीशस को स्वर्ग सदृष्य बनाया है, जिसे प्रत्यक्ष देखा जा सकता है.

यात्रा को यादगार और ऎतिहासिक बनाने में मारीशस के राष्ट्रपति महामहिम श्री कैलाश प्रयाग के साथ भेंट वार्ता और सामुहिक फ़ोटॊग्रुप महत्वपूर्ण रहे.
 इस ऎतिहासिक पल को सुगम और सुलभ बनाने में डा.अलका धनपत ,श्री राजनारायण गति एवं श्री राज हीरामन के सहयोग को कैसे विस्मृत किया जा सकता है?
इससे पूर्व डा.अलका धनपत ने विश्व हिन्दी सचिवालय की निदेशक श्रीमती कुंजलजी से सौजन्य भेंट करवायी थी. सचिवालय के वाचनालय के लिए मैंने अपना कहानी संग्रह तीस बरस घाटी, हिन्दी भवन भोपाल के मंत्री-संचालक श्री कैलाशचंद्र पंत की कृति संस्कार,संस्कृति और समाज, निदेशक डाकघर श्री कृष्णकुमार यादव एवं उनकी पत्नि श्रीमती आकांक्षा यादव की कृति अभिलाषा, सोलह आने सोलह लोग, जंगल में क्रीकेट, चांद पर पानी, डा.कौशलकिशोर श्रीवास्तव की कृति आए न बालम की प्रतियाँ भेंट की. उन्होंने बडी शालीनता के साथ इस भेंट को यह कहते हुए स्वीकारा कि उन्हें वे वाचनालय को सौंप देगी, ताकि यहाँ के लोग इन साहित्यिक कृतियों को पढ सकेंगे.
 उन पलों को भी कैसे विस्मृत किया जा सकता है जब डा.धनपत ने मारीशस रेडियो पर मेरा साक्षात्कार रिकार्ड करवाया और महात्मा गांधी संस्थान के प्राध्यापकों से हम सबकी भेंट करवाई थी. ज्ञात हो कि इस संस्थान की आधारशिला 3 जून 1970 को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधीजी एवं मारीशस के प्रधानमंत्री श्री शिवसागर रामगुलामजी के कर-कमलों से रखी गई थी.
यह यात्रा अपनी सफ़ल संगोष्ठी के साथ-साथ रोचक-मनोरंजक पर्यटन के रूप में भी याद रहेगी. देश की राजधानी पोर्ट लुइस में स्थित अनेक मंत्रालयों के आलीशान भवन, समुद्र में तैरते विशाल पोत, गगनचुंबी इमारतें, कैसिनो, सिनेमाघरों, तथा रेस्टारेंटॊं  को देखा जा सकता है. पास ही में एक पार्क है जिसमें देश के प्रथम प्रधानमंत्री श्री शिवसागर रामगुलाम की भव्य प्रतिमा स्थापित है. यहीं से कुछ दूरी पर स्थित है अप्रवासी घाट जहाँ पर भारत से बलपूर्वक या ठेके पर अथवा बंधक बनाकर लाए गए लोगों को मजदूरी करने के लिए उतारा जाता था. इस स्थान को देखते ही मन में एक अजीब से कसमसाहट और सघन पीडा का अनुभव होने लगता है. साथ ही आँखों के सामने वह भयावह दृष्य उपस्थित होने लगता है कि किस तरह भारत से हजारॊ किलोमीटर दूर स्थित इस विरान टापू तक पहुँच पाने तक उन मजदूरों कॊ कितनी शारीरिक पीडायें और मानसीक यातनाएँ झेलनी पडी होगी?. एक नहीं, दो नहीं बल्कि सैकडॊं की तादात में यहाँ मजदूर लाए जाते रहे हैं. जान लेवा समुद्री हवा के थपेडॊं को सहते हुए, न जाने कितने ही लोग बीमार पडॆ होंगे, और न जाने कितनों ने, अपने प्राण त्याग दिए होंगे ? मरने के बाद इनकी लाशों को बेरहमी से उठाकर समुद्र में फ़ेंक दिया जाता था, ताकि वे समुद्री जीव-जन्तुओं का भोजन बन सकें. जेहन में ये सारे कारुणिक दृष्य़ चलायमान हो उठते हैं और आँखें भर आती हैं. हम सभी मित्रों ने दो मिनट का मौन धारण करते हुए उन अनाम भारतीयों को अपने श्रद्धासुमन अर्पित किए और भारी मन से लौट पडॆ.
इस यात्रा के दौरान टामारिन्ड वाटरफ़ाल,, ट्राइ आक्स सफ़र्स,(मृत ज्वालामुखी), चामरेल कलर्ड अर्थ ,फ़ोर्ट आफ़ एडलेट को देखने के बाद मारीशस का सबसे पवित्र स्थान जिसे गंगा तालाब के नाम से जाना जाता है, देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ. इस परिसर में प्रवेश करने से पहले, आपको एक सौ आठ फ़ीट ऊँची शिवजी की प्रतिमा के दर्शन होते हैं. मन श्रद्धा से भर उठता है. इससे कुछ दूरी पर अवस्थित है गंगा तालाब. कभी परी तालाब के विख्यात इस सरोवर में भारत से गंगाजल लाकर डाला गया था. इसके बाद इस नाम गंगा तालाब पडा. सरोवर के किनारे शेषनाग मन्दिर, विष्णु-लक्ष्मी, राधा-कृष्ण, साईं, हनुमानजी की प्रतिमा, सात घोडॊं से जुते हुए एक दिव्य रथ पर आरूढ भगवान सूर्यदेव की सुन्दर और आकर्षक प्रतिमा देखी जा सकती है. इसी प्रांगण में एक विशाल शिव मन्दिर अवस्थित है. इसमें विराजे शिवलिंग के बारे में मान्यता है कि यह तेरहवाँ ज्योतिर्लिंग है. यहाँ की स्वछता, निर्मलता, तालाब का पारदर्शी पानी, और चारों ओर आच्छादित हरितिमा एवं आर्य संस्कृति का विस्तारित रूप देखकर, मन गदगद हो उठता है.
अपनी यादगार और सफ़ल यात्रा के दौरान की गई समुद्र की सैर, विभिन्न प्रकार के वाटर स्पोर्ट्स, पैराग्लाइडिंग, ग्लास-बोट की सवारी,जिससे समुद्र के भीतर गहराई तक झांका जा सकता है और चित्र-विचित्र कोरल, मछलियाँ और जीव-जंतुओ को देखा जा सकता है.
अभ्युदय बहुउद्देशीय़ संस्था के साथ की गई यह अविस्मरणीय़ यात्रा यादों को संजोते हुए संपन्न हुई और हम 29 मई प्रातः छः बजे नवल अरूणोदय के साथ, नव उमंगों, नव तरंगों सहित, नव सृजन की उत्कण्ठा लिए लौट आए.

            सम्पर्क-
             गोवर्धन यादव  (संयोजकम.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति) 
                103, कावेरीनगर,छिन्दवाडा(म.प्र.)480001
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