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सोमवार, 27 जून 2016

युवा कवि शिरोमणि महतो की कविताएं



     समकालीन रचनाकारों में प्रमुख स्थान रखने वाले शिरोमणि महतो  की कविताएं सरल शब्दों में बड़ा वितान रचती हैं कवि अपने लोक से कितना जुड़ा है । यह तो इन कविताओं को पढने के बाद ही जान पाएंगे।
युवा कवि  शिरोमणि महतो की कविताएं
नदी

मेरी माँ मेरे सर पर
हाथ रखती है
और एक नदी
छलछलाने लगती
-मेरे ऊपर

मेरी बहन कलाई में
राखी बांधती
और एक नदी
उडेल देती सारा जल
-मुझ पर

मेरी पत्नी होठों पर
एक चुम्बन लेती
और एक नदी
हिलोरे मारने लगती
-मेरे भीतर

माँ बहन और पत्नी
एक स्त्री के कई रूप
और एक नदी के
कई प्रतिरूप !

कोदो भात

कोदो गोंदली मंहुआ
अब देखने को नहीं मिलते
उखड़ गई इन फसलों की खेती
जैसे हम उखड़ गये अपनी जड़ों से !

आज कोदो का भात दुर्लभ है
लेकिन कहावत अभी जिन्दा है-
हाम तो बाप पके कोदो नायं खाईल हियो
पहले कोदो चावल से भी ज्यादा भोज्य था
तभी तो बनी थी-यह कहावत

धीरे-धीरे चावल भी छूटता जा रहा
और उसकी जगह लेता जा रहा
अब चौमीन-चाईनीज फूड....

जैसे-जैसे कोदा से चावल
और चावल से चाईनीज फूड
वैसे-वैसे भारत से इंडिया
होता जा रहा अपना देश....!
पता  : नावाडीह, बोकारो, झारखण्ड-829144  मोबाईल  : 9931552982

सोमवार, 18 मई 2015

शिरोमणि महतो की दो कविताएं

 हम झारखण्ड के युवा कवि शिरोमणि महतो की कविताएं प्रकाशि कर रहे हैं। झारखण्ड में जीवन&यापन करते हुए वहाँ की जनपदीय सोच को अभिव्यक्त करना जोखिम भरा काम है। हमने शिरोमणि महतो की उन कविताओं को तरजीह दी है। जिसमें उनका जनपद] उनका परिवेश  मुखर होता है। बेशक अपने परिवेश के शिरोमणि महतो अच्छे प्रवक्ता हैं। इस उत्तर आधुनिक समय में झारखण्ड और वहां की चिन्ताएं विश्व&पटल पर रखने का कौशल शिरोमणि महतो में है। वह बड़ी बारीकी से आस&पास विचरण करते समय की चुनौतियों को महसूस करते हैं और अपनी जिम्मेदारियां समझते हैं कि ऐसे कठिन समय में एक लोकधर्मी कवि की क्या भूमिका होनी चाहिएA
 
शिरोमणि महतो की दो कविताएं--

कर्म और भाग्य

जिसका भाग्य साथ होता
उसके साथ लागू होता-
न्यूटन का तृतीय गति-सिद्धांत
कर्म के बराकर मिलता-फल

जिसका भाग्य मंद होता
उसके कर्म का भी फल मिलता
जैसे एक कड़ाही साग
सीझने के बाद बचता-एक कलछुल !

और जिसका भाग्य तेज होता
उसका कर्म-फल गई गुना अधिक होता
जैसे एक पैला चावल
खदककर हो जाता-एक डेगची भात !



 














औरतें

किसी दूसरे ग्रह से
नहीं आती आरतें
सबके घरों में होती हैं
द्वार की तरह....
भीतर जीवन का सार
और बाहर अनंत बिस्तार

औरतें हमारे लिए
दोनो हैं-उत्पाद और उत्पादक

सभी औरतें
एक जैसी नहीं होतीं
वे सभी क्षेत्रों में
दो धु्रवों में खड़ी दिखती
हैं....

कुछ औरतें
सींच रही हैं-
जीवन की जड़ो को
अपनी गोद में
खिला रही हैं-सृष्टि  को !

और कुछ औरतें
अपने उन्नत उरोजों से
उठा लेना चाहती है-
समूचा ब्रह्माण्ड !

औरतें-
चुनौती बनती जा रही हैं
औरतों के लिए....!



 



















शिरोमणि महतो
शिक्षा-  - एम हिन्दी

सम्प्रति-  - अध्यापन एवं महुआ पत्रिका का सम्पादन

प्रका- - - कथादेश, हंस, कादम्बिनी, पाखी, वागर्थ, कथन, समावर्तन, पब्लिक एजेन्डा, समकालीन भारतीय साहित्य, सर्वनाम, युद्धरत आम आदमी, शब्दयोग, लमही, पाठ, पांडुलिपि, हमदलित, कौशिकी, नव निकश, दैनिक जागरण पुनर्नवा विशेषांक ,दैनिक हिन्दुस्तान, जनसत्ता विशेषांक, छपते-छपते विशेषांक, राँची एक्सप्रेस, प्रभात खबर एवं अन्य दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

पता- - - नावाडीह बोकारो झारखण्ड -829144

                         मोबाईल-09931552982

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

शिरोमणि महतो की कविताएं






हम झारखण्ड के युवा कवि शिरोमणि महतो की कविताएं प्रकाशि कर रहे हैं। झारखण्ड में जीवन&यापन करते हुए वहाँ की जनपदीय सोच को अभिव्यक्त करना जोखिम भरा काम है। हमने शिरोमणि महतो की उन कविताओं को तरजीह दी है। जिसमें उनका जनपद] उनका परिवेश  मुखर होता है। बेशक अपने परिवेश के शिरोमणि महतो अच्छे प्रवक्ता हैं। इस उत्तर आधुनिक समय में झारखण्ड और वहां की चिन्ताएं विश्व&पटल पर रखने का कौशल शिरोमणि महतो में है। वह बड़ी बारीकी से आस&पास विचरण करते समय की चुनौतियों को महसूस करते हैं और अपनी जिम्मेदारियां समझते हैं कि ऐसे कठिन समय में एक लोकधर्मी कवि की क्या भूमिका होनी चाहिएA



शिरोमणि महतो की कविताएं&







भावजें







भावजें बहुत शीलवती होती हैं



उनके व्यवहार से छलकता



शीतलता का तरह प्रवाह







वे हमें देखते ही



काढ़ लेती हैं-



लम्बा&सा घूंघट



और वे लगती बिल्कुल छुईमुई की तरह



झुकी डालियों की तरह







लोग कहते&



भावजें शुभ होती हैं



भैसुरों के लिए



अगर राह चलते



उनका मुख दिख जाये



तो समझो&यात्रा सफल !







इनसे सटी हुई



किसी चीज को



स्पर्श कर जाने से



हम छुआ जाते हैं



फिर हमारे सर पर



छिड़का जाता है



सोनापानी या गंगाजल



शायद रिश्तों में



पवित्रता की शुरूआत



यहीं से हुई हो







माँ&और बहन के रिष्तों से



अधिक महान होता



यह संबंध !







भावजों का सिर



हमेशा झुका रहता-



इनके ही सर पर टिका होता है



हमारे परिवार के



अभिमान का आकाश!











अखरा







गाँव की छाती में



होता&अखरा



जहाँ करमा में



लगता है&गहदम झूमर







औरतों के लिए



सबसे सुरक्षित स्वतंत्र



स्थान है&अखरा



धरती की आंत



जहाँ पुरूषों का दम्भ



पच जाता है !







जहाँ चौखट से बाहर



औरतें खोल पाती हैं



अपने पाँव और



अपनी आत्मा के अतल को







औरतें अखरा में



खुलकर नाचती है



पांवों के थके जाने तक



आत्मा के भर जाने तक !







जब पहली बार



टूटी होगी पुरूषों की अकड़



दरकी होगी दम्भ की दीवारें



तब जाके बना होगा



धरती की छाती में



अखरा] आत्मा की तरह!







जिसमें स्त्रियों के पांव



थिरके होंगे धड़कन की तरह



और स्त्रियों ने लिया होगा



खुली हवा में सांस



और मुक्त आकाश के नीचे



मुक्त कंठ से गाया होगा



मुक्ति का गान!A











संपर्क-  नावाडीह बोकारो झारखण्ड 2





99315529829931552982

 9931552982