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बुधवार, 24 अगस्त 2016

सुशांत सुप्रिय की कहानी : बँटवारा




    मेरा शरीर सड़क पर पड़ा था . माथे पर चोट का निशान था . क़मीज़ पर ख़ून के छींटे थे . मेरे चारो ओर भीड़ जमा थी . भीड़ उत्तेजित थी . देखते-ही-देखते भीड़ दो हिस्सों में बँट गई . एक हिस्सा मुझे हिंदू बता रहा था . केसरिया झंडे लहरा रहा था . दूसरा हिस्सा मुझे मुसलमान बता रहा था . हरे झंडे लहरा रहा था .
एक हिस्सा गरजा -- इसे *टुओं ने मारा है . यह हिंदू है . इसे जलाया जाएगा . इस पर हमारा हक़ है

दूसरा हिस्सा चिल्लाया -- इसे काफ़िरों ने मारा है . यह हमारा मुसलमान भाई है . इसे दफ़नाया जाएगा . इस पर हमारा हक़ है .
फिर ' जय श्री राम ' और ' अल्लाहो अकबर ' के नारे लगने लगे . मैं पास ही खड़ा यह तमाशा देख रहा था . क्या मैं मर चुका था ? भीड़ की प्रतिक्रिया से तो यही लगता था . मैंने कहा -- भाइयो , मैं मर गया हूँ तो भी पहले मुझे अस्पताल तो ले चलो . कम-से-कम मेरा ' पोस्ट-मार्टम ' ही हो जाए . पता तो चले कि मैं कैसे मरा .

भीड़ बोली -- ना बाबा ना . हम तुम्हें अस्पताल नहीं ले जा सकते . यह 'पुलिस-केस' है . बेकार में कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने पड़ेंगे . एक बार फिर ' जय श्री राम ' और ' अल्लाहो अकबर ' के नारे गूँजने लगे . भीड़ एक-दूसरे के ख़ून की प्यासी होती जा रही थी . डर के मारे मैं पास के एक पेड़ पर जा चढ़ा . इन जुनूनियों का क्या भरोसा . मरे हुए को कहीं दोबारा न मार दें .
  मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ . सड़क पर जो पड़ा था वह मेरा ही शरीर था . फिर मेरे शरीर को जलाया जाए या दफ़नाया जाए , इस बारे में इन्हें मुझ से तो सलाह-मशविरा करना चाहिए था . पर भीड़ थी कि मुझे सुनने को तैयार ही नहीं थी .
  मैंने अनुरोध के स्वर में फिर कहा -- भाइयो , मुझ जैसे अदना इंसान के लिए आप लोग साम्प्रदायिक सद्भाव क्यों तोड़ रहे हो ? कृपा करके भाईचारा बनाए रखो . मिल-बैठ कर तय कर लो कि मुझे जलाया जाना चाहिए या दफ़नाया जाना चाहिए . अगर बातचीत से मामला नहीं सुलझे तो मामला अदालत में ले जाओ . भीड़ बोली -- अदालत न्याय देने में बहुत देर लगाती है . पचास-पचास साल तक मुक़दमा चलता रहता है . निचली अदालत का फ़ैसला आने पर फिर हाइ-कोर्ट , सुप्रीम कोर्ट में अपील हो जाती है . तब तक तुम्हारे शरीर का क्या होगा ?
  मैंने कहा -- भाइयो , ख़ून-ख़राबे से बचने के लिए मैं अदालत का फ़ैसला आने तक ' ममी ' बने रहने के लिए भी तैयार हूँ . पर भीड़ के सिर पर तो ख़ून सवार था . कोई इतना समय रुकने के लिए तैयार नहीं था . इस पर मैंने कहा -- भाइयो , तो फिर आप लोग सिक्का उछाल कर फ़ैसला कर लो . टॉस में जो पक्ष जीत जाए वह अपने मुताबिक़ मेरे शरीर को जला या दफ़ना दे . भीड़ ने कहा -- हमने ' शोले ' देखी है . हम इस चाल में नहीं आएँगे . अजीब मुसीबत थी . नीचे सड़क पर मेरा शरीर पड़ा हुआ था . चारो ओर उन्मादियों की भीड़ जमा थी . पास ही के पेड़ पर मैं चढ़ा हुआ था. अपने शरीर को इस तरह देखने का मेरा पहला अवसर था . मुझे अपने शरीर पर दया आई . उससे भी ज़्यादा दया मुझे भीड़ पर आई . मेरी लाश पर क़ब्ज़े को ले कर ये लोग मरने-मारने पर उतारू थे . तभी एक पढ़ा-लिखा-सा दंगाई मेरे पेड़ की ओर इशारा करता हुआ अंग्रेज़ी में चिल्लाया -- गिटपिट-गिटपिट ... ब्लडी-फ़ूल ... गिटपिट-गिटपिट ... किल हिम ... !
 
बहुत से दंगाई लाश को छोड़ कर उस पेड़ के नीचे जमा हो गए जिस पर मैं चढ़ा बैठा था . डर के मारे मैं एक डाल और ऊपर चढ़ गया . नीचे से दंगाई चिल्लाए -- जल्दी से तू खुद ही बता तू कौन है , वर्ना हम तुझे फिर से मार डालेंगे . अजीब लोग थे . मरे हुए को फिर से मारना चाहते थे . मैंने दिमाग़ पर बहुत ज़ोर डाला . पर मुझे कुछ भी याद नहीं आया कि मैं हिंदू था या मुसलमान . जिन्हें अपने बारे में कुछ भी याद नहीं होता, वे किस धर्म के होते हैं? उनका क्या नाम होता है? राम रहीम सिंह डेविड?

भीड़ अब बेक़ाबू होती जा रही थी . दोनो ओर से त्रिशूल और तलवारें लहराई जा रही थीं . ' जय श्री राम ' और ' अल्लाहो अकबर ' के नारों से आकाश गूँज रहा था .
  कहीं दंगा-फ़साद न शुरू हो जाए , यह सोच कर मैंने एक बार फिर कोशिश की -- भाइयो , शांत रहो . अगर कोई हल नहीं निकलता तो मेरा आधा शरीर हिंदू ले लो . तुम उसे जला दो . बाक़ी का आधा शरीर मुसलमान ले लो . तुम उसे दफ़ना दो . मुझे न्यायप्रिय सम्राट् विक्रमादित्य का फ़ैसला याद आया . मैंने सोचा , अब कोई एक पक्ष पीछे हट जाएगा ताकि मेरी लाश की दुर्गति न हो. पर भीड़ गँड़ासे , तलवार और छुरे ले कर मेरे शरीर के दो टुकड़े करने के लिए वाकई आगे बढ़ी . मैं पेड़ की ऊँची डाल पर बैठा होते हुए भी थर-थर काँपने लगा . जो शरीर दो हिस्सों में काटा जाना था वह आख़िर था तो मेरा ही .
  ये कैसे लोग थे जो लाश का भी बँटवारा करने पर तुले हुए थे? मैंने उन्हें ध्यान से देखा . भीड़ में दोनो ओर वैसे ही चेहरे थे . जैसे चेहरे केसरिया झंडे पकड़े थे , वैसे ही चेहरे हरा झंडा पकड़े भी नज़र आए . ठीक वही वहशी आँखें , ठीक वही विकृत मुस्कान भीड़ में दोनो ओर मौजूद थीं . नरसंहारों मे ये ही लोग लिप्त थे .
  भीड़ गँडासों , तलवारों , और छुरों की धार परख रही थी . काश हमारे ' स्टैच्यू ' कहने पर सभी हत्यारे , सभी दंगाई बुत बन जाते . और फिर हम उन्हें गहरे समुद्र में डुबा आते.
  भीड़ ने हथियार उठा कर मेरी लाश पर चलाने की तैयारी कर ली थी . तभी उन में से कोई चिल्लाया -- अबे , इसकी पतलून उतार कर देख. अभी पता चल जाएगा कि स्साला हिंदू है या मुसलमान. अभी यह बेइज़्ज़ती भी बाक़ी थी. कई जोड़ी हाथ मेरी लाश पर से पतलून उतारने लगे. अब मुझ से रहा नहीं गया. मैं पेड़ पर से कूदा और 'बचाओ, बचाओ' चिल्लाया .
  पर मेरी वहाँ कौन सुनता . देखते-ही-देखते दंगाइयों ने मेरी लाश को नंगा कर डाला . शर्म से मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं . छि:छि: ! शिव-शिव ! लाहौलविलाकूवत ! एक मिला-जुला-सा शोर उठा . आँखें खोलते ही मैं सारा माजरा समझ गया. और मुझे याद आ गया कि मैं कौन था. कुछ दंगाई अश्लील मज़ाक पर उतर आए थे. कुछ दोनो हाथों से ताली बजा-बजा कर ' हाय-हाय ' करने लगे थे . अरे ये तो ' वो ' निकला -- दंगाई एक-दूसरे से कह रहे थे और हँस रहे थे .
  माहौल में तनाव एकाएक कम हो गया . मैंने राहत की साँस ली . धीरे-धीरे दंगाइयों की भीड़ छँटने लगी . केसरिया झंडे वाले एक ओर चल दिए . हरे झंडे वाले दूसरी ओर चल दिए . आज त्रिशूलों और तलवारों का दिन नहीं था . अब मैं अपनी नंगी लाश के पास अकेला रह गया था .
अगर इस तरह से दंगे-फ़साद रुक सकें तो काश , ऊपर वाला सबको ' वो ' बना दे -- मैंने सोचा .

  
सुशांत सुप्रिय   
ए-5001 ,गौड़ ग्रीन सिटी ,
वैभव खंड ,इंदिरापुरम ,
ग़ाज़ियाबाद -201014( उ. प्र. )
मो: 8512070086
ई-मेल : sushant1968@gmail.com

रविवार, 3 जुलाई 2016

कहानी : मजबूरी -सुशांत सुप्रिय

    श्री सुशांत सुप्रिय हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेज़ी में लिखते हैं. हत्यारे , हे राम , दलदल  इनके कुछ कथा संग्रह हैं, अयोध्या से गुजरात तक और इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं  इनके काव्य संकलन. इनकी कई कहानियाँ और कविताएँ विभिन्न भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं. अनेक कहानियाँ  कई राज्यों के स्कूलों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित हैं, कविताएँ पूणे विश्व-विद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल हैं और विभिन्न विश्वविद्यालयों के शोधार्थी इनकी कहानियों पर शोध कर रहे हैं. भाषा विभाग ( पंजाब ) तथा प्रकाशन विभाग ( भारत सरकार ) द्वारा इनकी रचनाएँ पुरस्कृत की गई हैं. कमलेश्वर-कथाबिंब कहानी प्रतियोगिता ( मुंबई ) में लगातार दो वर्ष प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किये गए.



 कहानी  : मजबूरी  - सुशांत सुप्रिय


         
जब सुबह झुनिया वहाँ पहुँची तो बंगला रात की उमस में लिपटा हुआ गर्मी में उबल रहा था । सुबह सात बजे की धूप में तल्ख़ी थी । वह तल्ख़ी उसे मेम साहब की तल्ख़ ज़बान की याद दिला रही थी ।
         
बाहरी गेट खोल कर वह जैसे ही अहाते में आई , भीतर से कुत्ते के भौंकने की भारी-भरकम आवाज़ ने उसके कानों में जैसे पिघला सीसा डाल दिया ।  उँगलियों से कानों को मलते हुए वह बंगले के दरवाज़े पर पहुँची । घंटी बजाने से पहले ही दरवाज़ा खुल चुका था ।
          "
तुम रोज़ देर से आ रही हो । ऐसे नहीं चलेगा । " सुबह बिना मेक-अप के मेम-साहब का चेहरा उनकी चेतावनी जैसा ही भयावह लगता था ।
          "
बच्ची बीमार थी ... । " उसने अपनी विवश आवाज़ को छिपकली की कटी-पूँछ-सी तड़पते हुए देखा ।
          "
रोज़ एक नया बहाना ! " मेम साहब ने उसकी विवश आवाज़ को ठोकर मार कर परे फेंक दिया । वह वहीं किनारे पड़ी काँपती रही ।
          "
सारे बर्तन गंदे पड़े हैं । कमरों की सफ़ाई होनी है । कपड़े धुलने हैं । हम लोग क्या तुम्हारे इंतज़ार में बैठे रहें कि कब महारानी जी प्रकट होंगी और कब काम शुरू होगा ! हुँह् ! " मेम साहब की नुकीली आवाज़ ने उसके कान छलनी कर दिए ।
वह चुपचाप रसोई की ओर बढ़ी । पर वह मेम साहब की कँटीली निगाहों का अपनी पीठ में चुभना महसूस कर रही थी । जैसे वे मारक निगाहें उसकी खाल चीरकर उसके भीतर जा चुभेंगी ।
          जल्दी ही वह जूठे बर्तनों के अंबार से जूझने लगी ।
          "
सुन झुनिया ! " मेम साहब की आवाज़ ड्राइंग रूम को पार करके रसोई तक पहुँची और वहाँ उसने एक कोने में दम तोड़ दिया । जूठे बर्तनों के अंबार के बीच उसने उस आवाज़ की ओर कोई ध्यान नहीं दिया ।
          "
अरे , बहरी हो गई है क्या ? "
          "
जी , मेम साहब । "
          "
ध्यान से बर्तन धोया कर । क्राकरी बहुत महँगी है । कुछ भी टूटना नहीं चाहिए । कुछ भी टूटा तो तेरी पगार से पैसे काट लूँगी , समझी ? " उसे मेम साहब की आवाज़ किसी कटहे कुत्ते के भौंकने जैसी लगी ।
          "
जी , मेम साहब । "
           
ये बड़े लोग थे । साहब लोग थे । कुछ भी कह सकते थे । उसने कुछ कहा तो उसे नौकरी से निकाल सकते थे । उसकी पगार काट सकते थे -- उसने सोचा ।
क्या बड़े लोगों को दया नहीं आती ? क्या बड़े लोगों के पास दिल नाम की चीज़ नहीं होती ? क्या बड़े लोगों से कभी ग़लती नहीं होती ?
           
बर्तन साफ़ कर लेने के बाद उसने फूल झाड़ू उठा लिया ताकि कमरों में झाड़ू लगा सके । बच्चे के कमरे में उसने ज़मीन पर पड़ा खिलौना उठा कर मेज़ पर रख दिया । तभी एक नुकीली , नकचढ़ी आवाज़ उसकी छाती में आ धँसी -- " तूने मेरा खिलौना क्यों छुआ , डर्टी डम्बो ? मोरोन ! " यह मेम साहब का बिगड़ा हुआ आठ साल का बेटा जोजो था । वह हमेशा या तो मोबाइल पर गेम्स खेलता रहता या टी.वी. पर कार्टून देखता रहता । मेम साहब या साहब के पास उसके लिए समय नहीं था , इसलिए वे उसे सारी सुविधाएँ दे देते थे । वह ए.सी. बस में बैठ कर किसी महँगे स्कूल में पढ़ने जाता था । कभी-कभी देर हो जाने पर मेम साहब का ड्राइवर उसे मर्सिडीज़ गाड़ी में स्कूल छोड़ने जाता था ।
           
झुनिया का बेटा मुन्ना जोजो के स्कूल में नहीं पढ़ता था । वह सरकारी स्कूल में पढ़ता था । हालाँकि मुन्ना अपना भारी बस्ता उठाए पैदल ही स्कूल जाता था , उसका चेहरा किसी खिले हुए फूल-सा था । जब वह हँसता तो झुनिया की दुनिया आबाद हो जाती -- पेड़ों की डालियों पर चिड़ियाँ चहचहाने लगतीं , आकाश में इंद्रधनुष उग आता , फूलों की क्यारियों में तितलियाँ उड़ने लगती , कंक्रीट-जंगल में हरियाली छा जाती । मुन्ना एक समझदार लड़का था । वह हमेशा माँ की मदद करने के लिए तैयार रहता ...
           
हाथ में झाड़ू लिए हुए झुनिया ने दरवाज़े पर दस्तक दी और साहब के कमरे में प्रवेश किया । साहब रात में देर से घर आते थे और सुबह देर तक सोते रहते थे । 
महीने में ज़्यादातर वे काम के सिलसिले में शहर से बाहर ही रहते थे । झुनिया की छठी इन्द्रिय जान गई थी कि साहब ठीक आदमी नहीं थे । एक बार मेम साहब घर से बाहर गई थीं तो साहब ने आँख मार कर उससे कहा था -- " ज़रा देह दबा दे । पैसे दूँगा । " झुनिया को वह किसी आदमी की नहीं , किसी नरभक्षी की आवाज़ लगी थी । साहब के शब्दों से शराब की बू आ रही थी । उनकी आँखों में वासना के डोरे उभर आए थे । उसने मना कर दिया था और कमरे से बाहर चली गई थी । पर उसकी हिम्मत नहीं हुई थी कि वह मेम साहब को यह बता पाती । कहीं मेम साहब उसी को नौकरी से निकाल देतीं तो ? यह बात उसने अपने रिक्शा-चालक पति को भी नहीं बताई थी । वह उसे बहुत प्यार करता था । यह सब सुन कर उसका दिल दुखता ...
           
झाड़ू मारना ख़त्म करके अब वह पोंछा मार रही थी ।
             "
, इतना गीला पोंछा क्यों मार रही है ? कोई गिर गया तो ? " मेम साहब की आवाज़ किसी आदमखोर जानवर-सी घात लगाए बैठी होती । उससे ज़रा-सी ग़लती होते ही वह उस पर टूट पड़ती और उसे नोच डालती ।
           
अब गंदे कपड़ों का एक बहुत बड़ा गट्ठर उसके सामने था ।
             "
कपड़े बहुत गंदे धुल रहे हैं आजकल । " यह साहब थे । दबे पाँव उठ कर दृश्य के अंदर आ गए थे । उसने सोचा , अगर उस दिन उसने साहब की देह दबा दी होती तो भी क्या साहब आज यही कहते ? यह सोचते ही उसके मुँह में एक कसैला स्वाद भर गया ।
             "
ये लोग होते ही कामचोर हैं । " मेम-साहब का उससे जैसे पिछले जन्म का बैर था । " बर्तन भी गंदे धोती है ! ठीक से काम कर वर्ना पैसे काट लूँगी ! " यह आवाज़ नहीं थी , धमकी का जंगली पंजा था जो उसका मुँह नोच लेना चाहता था ।
             
झुनिया के भीतर विद्रोह की एक लहर-सी उठी । वह चीख़ना-चिल्लाना चाहती थी । वह इन साहब लोगों को बताना चाहती थी कि वह पूरी ईमानदारी से , ठीक से काम करती है । कि वह कामचोर नहीं है । वह झूठे इल्ज़ाम लगाने के लिए मेम साहब का मुँह नोच लेना चाहती थी । लेकिन वह चुप रह गई ...
             
एक चूहा मेम साहब की निगाहों से बच कर कमरे के एक कोने से दूसरे कोने की ओर तेज़ी से भागा । लेकिन झुनिया ने उसे देख लिया । अगर रात में सोते समय यह चूहा मेम साहब की उँगली में काट ले तो कितना मज़ा आएगा -- उसने सोचा । मेम साहब चूहे को नहीं डाँट सकती , उसकी पगार नहीं काट सकती , उसे नौकरी से नहीं निकाल सकती ! इस ख़्याल ने उसे खुश कर दिया । ज़िंदगी की छोटी-छोटी चीज़ों में अपनी ख़ुशी खुद ही ढूँढ़नी होती है -- उसने सोचा ।
             "
सुन , मैं ज़रा बाज़ार जा रही हूँ । काम ठीक से ख़त्म करके जाना , समझी ? " 
 
मेम साहब ने अपनी ग़ुस्सैल आवाज़ का हथगोला उसकी ओर फेंकते हुए कहा । " सुनो जी , देख लेना ज़रा । " यह सलाह साहब के लिए थी ।
             
काम ख़त्म करके वह चलने लगी तो उसने देखा कि ड्राइंग रूम में खड़े साहब न जाने कब से उसकी देह को गंदी निगाहों से घूर रहे थे । सकुचा कर उसने अपनी साड़ी का पल्लू और कस कर अपनी छाती पर लपेट लिया और बाहर अहाते में निकल आई । पर उसे लगा जैसे साहब की वासना भरी आँखें उसकी पीठ से चिपक गई हैं । उसे घिन महसूस हुई । यहाँ तो हर घर में एक आसाराम था ।
             "
सुनो , शाम को जल्दी आ जाना , और मुझ से अपनी पगार ले जाना । "
साहब की वासना भरी आवाज़ जैसे उसकी देह से लिपट जाना चाहती थी । उसे लगा जैसे यह घर नहीं , किसी अँधेरे कुएँ का तल था । उसका मन किया कि वह यहाँ से कहीं बहुत दूर भाग जाए और फिर कभी यहाँ नहीं आए । लेकिन तभी उसे अपनी बीमार बच्ची याद आ गई , उसकी महँगी दवाइयाँ याद आ गईं , और रसोई में पड़े ख़ाली डिब्बे याद आ गए ...

सुशांत सुप्रिय 
A-5001 ,गौड़ ग्रीन सिटी ,
वैभव खंड ,इंदिरापुरम ,
ग़ाज़ियाबाद - 201014 ( उ. प्र . )
   
मो: 08512070086  ई-मेल: sushant1968@gmail.com
 


शनिवार, 28 मई 2016

कहानी : बदबू - सुशांत सुप्रिय




   
    श्री सुशांत सुप्रिय हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेज़ी में लिखते हैं. हत्यारे , हे राम , दलदल  इनके कुछ कथा संग्रह हैं, अयोध्या से गुजरात तक और इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं  इनके काव्य संकलन. इनकी कई कहानियाँ और कविताएँ विभिन्न भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं. अनेक कहानियाँ  कई राज्यों के स्कूलों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित हैं, कविताएँ पूणे विश्व-विद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल हैं और विभिन्न विश्वविद्यालयों के शोधार्थी इनकी कहानियों पर शोध कर रहे हैं. भाषा विभाग ( पंजाब ) तथा प्रकाशन विभाग ( भारत सरकार ) द्वारा इनकी रचनाएँ पुरस्कृत की गई हैं. कमलेश्वर-कथाबिंब कहानी प्रतियोगिता ( मुंबई ) में लगातार दो वर्ष प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किये गए.
कहानी  : बदबू - सुशांत सुप्रिय 

            रेल-यात्राओं का भी अपना ही मज़ा है । एक ही डिब्बे में पूरे भारत की सैर हो जाती है । ' आमार सोनार बांग्ला ' वाले बाबू मोशाय से लेकर ' बल्ले-बल्ले ' वाले सरदारजी तक , ' वणक्कम् ' वाले तमिल भाई से लेकर ' केम छो ' वाले गुजराती सेठ तक -- सभी से रेलगाड़ी के उसी डिब्बे में मुलाक़ात हो जाती है । यहाँ तरह-तरह के लोग मिल जाते हैं । विचित्र क़िस्म के अनुभव हो जाते हैं ।

            पिछली सर्दियों में मेरे साथ ऐसा ही हुआ । मैं और मेरे एक परिचित विमल किसी काम के सिलसिले में राजधानी एक्सप्रेस से दिल्ली से रायपुर जा रहे थे । हमारे सामने वाली सीट पर फ़्रेंचकट दाढ़ीवाला एक व्यक्ति अपनी पत्नी और तीन साल के बच्चे के साथ यात्रा कर रहा था । परस्पर अभिवादन हुआ । शिष्टाचारवश मौसम से जुड़ी कुछ बातें हुईं । उसके अनुरोध पर हमने अपनी नीचे वाली बर्थ उसे दे दी और हम दोनो ऊपर वाली बर्थ पर चले आए ।

            मैं अख़बार के पन्ने पलट रहा था । तभी मेरी निगाह नीचे बैठे उस व्यक्ति पर पड़ी । वह बार-बार हवा को सूँघने की कोशिश करता , फिर नाक-भौंह सिकोड़ता ।
उसके हाव-भाव से साफ़ था कि उसे किसी चीज़ की बदबू आ रही थी । वह रह-रह कर अपने दाहिने हाथ से अपनी नाक के इर्द-गिर्द की हवा को उड़ाता । विमल भी यह सारा तमाशा देख रहा था । आख़िर उससे रहा नहीं गया । वह पूछ बैठा -- " क्या हुआ , भाई साहब ? "

            " बड़ी बदबू आ रही है । " फ़्रेंचकट दाढ़ीवाले उस व्यक्ति ने बड़े चिड़चिड़े स्वर में कहा ।
            विमल ने मेरी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा । मुझे भी कुछ समझ नहीं आया ।
            मैंने जीवन में कभी यह दावा नहीं किया कि मेरी नाक कुत्ते जैसी है । मुझे और विमल -- हम दोनो को ही कोई दुर्गन्ध नहीं सता रही थी । इसलिए , उस व्यक्ति के हाव-भाव हमें कुछ अजीब से लगे । मैं फिर अख़बार पढ़ने में व्यस्त हो गया । विमल ने भी अख़बार का एक पन्ना उठा लिया ।
            पाँच-सात मिनट बीते होंगे कि मेरी निगाह नीचे गई । नीचे बैठा व्यक्ति अब बहुत उद्विग्न नज़र आ रहा था । वह चारो ओर टोही निगाहों से देख रहा था । जैसे बदबू के स्रोत का पता लगते ही वह कोई क्रांतिकारी क़दम उठा लेगा । रह-रहकर उसका हाथ अपनी नाक पर चला जाता । आख़िर उसने अपनी पत्नी से कुछ कहा । पत्नी ने बैग में से ' रूम-फ़्रेश्नर ' जैसा कुछ निकाला और हवा में चारो ओर उसे' स्प्रे ' कर दिया । मैंने विमल को आँख मारी । वह मुस्करा दिया । किनारेवाली बर्थ पर बैठे एक सरदारजी भी यह सारा तमाशा हैरानी से देख रहे थे

            चलो , अब शायद इस पीड़ित व्यक्ति को कुछ आराम मिलेगा -- मैंने मन-ही-मन सोचा ।
            पर थोड़ी देर बाद क्या देखता हूँ कि फ़्रेंचकट दाढ़ी वाला वह उद्विग्न व्यक्ति
वही पुरानी हरकतें कर रहा है । तभी उसने अपनी पत्नी के कान में कुछ कहा । पत्नी परेशान-सी उठी और हमें सम्बोधित करके कहने लगी , " भाई साहब , यह जूता किसका है ? इसी में से बदबू आ रही है । "

             जूता विमल का था । वह उत्तेजित स्वर में बोला , " यहाँ पाँच-छह जोड़ी जूते पड़े हैं । आप यह कैसे कह सकती हैं कि इसी जूते में से बदबू आ रही है । वैसे भी , मेरा जूता और मेरी जुराबें , दोनों नई हैं और साफ़-सुथरी हैं । "

             इस पर उस व्यक्ति की पत्नी कहने लगी , " भाई साहब , बुरा मत मानिएगा । इन्हें बदबू सहन नहीं होती । उलटी आने लगती है । आप से गुज़ारिश करती हूँ , आप अपने जूते पालिथीन में डाल दीजिए । बड़ी मेहरबानी होगी । "
           विमल ग़ुस्से और असमंजस में था । तब मैंने स्थिति को सँभाला ," देखिए ,
हमें तो कोई बदबू नहीं आ रही । पर आप जब इतनी ज़िद कर रही हैं तो यही सही ।"

            बड़े बेमन से विमल ने नीचे उतर कर अपने जूते पालिथीन में डाल दिए ।
            मैंने सोचा --  चलो , अब बात यहीं ख़त्म हो जाएगी । पर थोड़ी देर बाद वह व्यक्ति उठा और मुझसे कहने लगा , " भाई साहब , मुझे नीचे अब भी बहुत बदबू आ रही है । आप नीचे आ जाइए । मैं वापस ऊपरवाली बर्थ पर जाना चाहता हूँ । "

            अब मुझसे नहीं रहा गया । मैंने कहा , " क्या आप पहली बार रेल-यात्रा कर रहे हैं ? भाई साहब , आप अपने घर के ड्राइंग-रूम में नहीं बैठे हैं । यात्रा में कई तरह की गंध आती ही हैं । टॉयलेट के पास वाली बर्थ मिल जाए तो वहाँ की दुर्गन्ध आती है । गाड़ी जब शराब बनाने वाली फ़ैक्ट्री के बगल से गुज़रती है तो वहाँ की गंध आती है । यात्रा में सब सहने की आदत डालनी पड़ती है । "

            विमल ने भी धीरे से कहा , " इंसान को अगर कुत्ते की नाक मिल जाए तो बड़ी मुश्किल होती है ! "
            पर उस व्यक्ति ने शायद विमल की बात नहीं सुनी । वह अड़ा रहा कि मैं नीचे आ जाऊँ और वह ऊपर वाली बर्थ पर ही जाएगा ।
            मैंने बात को और बढ़ाना ठीक नहीं समझा । इसलिए मैंने ऊपर वाली बर्थ
उसके लिए ख़ाली कर दी । वह ऊपर चला गया ।

            थोड़ी देर बाद जब उस व्यक्ति की पत्नी अपने बड़े बैग में से कुछ निकाल रही थी तो वह अचानक चीख़कर पीछे हट गई ।
            सब उसकी ओर देखने लगे ।
            " क्या हुआ ? " ऊपर वाली बर्थ से उस व्यक्ति ने पूछा ।
            " बैग में मरी हुई छिपकली है ।" उसकी पत्नी ने जवाब दिया ।
            यह सुनकर विमल ने मुझे आँख मारी । मैं मुस्करा दिया ।
             वह व्यक्ति खिसियाना-सा मुँह लिए नीचे उतरा ।

             " भाई साहब , बदबू का राज अब पता चला ! " सरदारजी ने उसे छेड़ा । वह और झेंप गया ।
              ख़ैर । उस व्यक्ति ने मरी हुई छिपकली को खिडकी से बाहर फेंका । फिर वह बैग में से सारा सामान निकाल कर उसे डिब्बे के अंत में ले जा कर झाड़ आया ।
हम सबने चैन की साँस ली । चलो , मुसीबत ख़त्म हुई -- मैंने सोचा ।
              पैंट्री-कार से खाना आ गया था । सबने खाना खाया । इधर-उधर की बातें हुईं । फिर सब सोने की तैयारी करने लगे ।
              तभी मेरी निगाह उस आदमी पर पड़ी । उद्विग्नता की रेखाएँ उसके चेहरे पर लौट आई थीं । वह फिर से हवा को सूँघने की कोशिश कर रहा था ।
              " मुझे अब भी बदबू आ रही है ... ", आख़िर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए उसने कहा ।
              " हे भगवान ! " मेरे मुँह से निकला ।
              यह सुनकर विमल ने मोर्चा सँभाला , " भाई साहब , मेरी बात ध्यान से सुनिए । बताइए , हम किस युग में जी रहे हैं ? यह कैसा समय है ? हम कैसे लोग
 हैं ? "
               " क्या मतलब ? " वह आदमी कुछ समझ नहीं पाया ।

               " देखिए , हम सब एक बदबूदार युग में जी रहे हैं । यह समय बदबूदार है । हम लोग बदबूदार हैं । यहाँ नेता भ्रष्ट हैं , वे बदबूदार हैं । अभिनेता अंडरवर्ल्ड से मिले हैं , वे बदबूदार हैं । अफ़सर घूसखोर हैं , वे बदबूदार हैं । दुकानदार मिलावट करते हैं , वे बदबूदार हैं । हम और आप झूठ बोलते हैं , दूसरों का हक़ मारते हैं , अनैतिक काम करते हैं -- हम सभी बदबूदार हैं । जब यह सारा युग बदबूदार है , यह समय बदबूदार है , यह समाज बदबूदार है , हम लोग बदबूदार हैं , ऐसे में यदि आपको अब भी बदबू आ रही है तो यह स्वाभाविक है । आख़िर इस डिब्बे में हम बदबूदार लोग ही तो बैठे हैं ...। "

                         ------------०------------

   सुशांत सुप्रिय
  A-5001 ,गौड़ ग्रीन सिटी ,
  वैभव खंड ,इंदिरापुरम ,
  ग़ाज़ियाबाद - 201014 ( उ. प्र . )
   
मो: 08512070086  ई-मेल: sushant1968@gmail.com
                      

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

कहानी कभी नहीं मरती : सुशांत सुप्रिय



श्री सुशांत सुप्रिय हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेज़ी में लिखते हैं. हत्यारे , हे राम , दलदल  इनके कुछ कथा संग्रह हैं, अयोध्या से गुजरात तक और इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं  इनके काव्य संकलन. इनकी कई कहानियाँ और कविताएँ विभिन्न भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं. अनेकों कहानियाँ  कई राज्यों के स्कूलों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित हैं, कविताएँ पूणे विश्व-विद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल हैं और विभिन्न विश्वविद्यालयों के शोधार्थी इनकी कहानियों पर शोध कर रहे हैं. भाषा विभाग ( पंजाब ) तथा प्रकाशन विभाग ( भारत सरकार ) द्वारा इनकी रचनाएँ पुरस्कृत की गई हैं. कमलेश्वर-कथाबिंब कहानी प्रतियोगिता ( मुंबई ) में लगातार दो वर्ष प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किये गए.

कहानी कभी नहीं मरती : सुशांत सुप्रिय

        उसके लिए जो नहीं होते हुए भी स्मृति में दस्तक-सा ,
        धूप में ऊष्मा-सा , अहसास में स्पर्श-सा हर पल है --
        अपने नहींपन में भी अपने होने का स्थान लेता हुआ ।

वे ख़ुद भी एक कहानी थे । एक लम्बी कहानी । और उनके भीतर मौजूद थीं -- अनगिनत कहानियाँ । क्या वे क़िस्से-कहानियों की खेती करते हैं -- हम सारे बच्चे अक्सर हैरान होकर यह सोचते ।

             छब्बे पा' जी  के पास अद्भुत कहानियों का ख़ज़ाना था । हालाँकि वे हम बच्चों के पिता की उम्र के थे लेकिन गली में सभी उन्हें पा' जी ( भैया ) ही कहते थे । प्याज की परतों की तरह उनकी हर कहानी के भीतर कई कहानियाँ छिपी होतीं । अविश्वसनीय कथाएँ । उनसे कहानियाँ सुनते-सुनते हम बच्चे किसी और ही ग्रह-नक्षत्र पर चले जाते । अवाक् और मंत्रमुग्ध हो कर हम उनकी कहानियों की दुनिया में गुम हो जाते । उनके शब्दों के जादू में खो जाते । परियाँ, जिन्न, भूत-प्रेत, देवी-देवता, राक्षस-चुड़ैल -- उनके कहने पर ये सब हमारी आँखों के सामने प्रकट होते या ग़ायब हो जाते । छब्बे पा' जी की एक आवाज़ पर असम्भव सम्भव हो जाता । मौसम करवट बदल लेता । दिशाएँ झूम उठतीं । प्रकृति मेहरबान हो जाती । बुराई घुटने टेक देती । शंकाएँ भाप बनकर उड़ जातीं

             छब्बे पा' जी की कहानियाँ पंचतंत्र से महाभारत तक , रामायण से अलिफ़-लैला तक फैली होतीं । हीर-राँझा , मिर्ज़ा साहिबाँ , सस्सी पुन्नू , सोहनी महिवाल , पूरन भगत , राजा रसालू , दुल्ला भट्टी , जीऊणा मौड़ और कैमा मलकी के क़िस्से उन्हें ऐसे कंठस्थ थे जैसे बच्चे को दो का पहाड़ा रटा होता है । लेकिन इनसे भी ज़्यादा रोचक वे कहानियाँ होतीं जिनके स्रोत हम बड़े होने के बाद भी नहीं जान
 पाए । क्या वे अद्भुत कहानियाँ उन्होंने खुद गढ़ी थीं ?

               कभी-कभी छब्बे पा' जी कुछ दिनों के लिए अपने गाँव चले जाते । उनका गाँव अमृतसर शहर से पन्द्रह-बीस किलोमीटर दूर था । तब मुझे उनकी कमी बहुत शिद्दत से खलती , क्योंकि तब मैं उनकी अद्भुत कहानियाँ सुनने से वंचित रह जाता । तब मैं कल्पना करता कि काश , कहानियाँ पेड़ों पर फलों की तरह उगतीं । यदि ऐसा होता
 तो हम सब बच्चे उन्हें पेड़ों से तोड़-तोड़ कर उनका खूब स्वाद लेते । किसी पेड़ पर एक तरह की कहानी तो किसी दूसरे पेड़ पर दूसरी तरह की कहानी । कहीं संतरा-कहानी तो कहीं अमरूद-कहानी ।
 
कई बार छब्बे पा' जी छुट्टी वाले दिन भी शहर में ही किसी काम से निकल जाते और रात तक घर नहीं लौटते । ऐसे में हम बच्चे सारा दिन उनकी राह देखते
रहते । जब वे नहीं लौटते तो मैं सोचने लगता कि वे क्या कर रहे होंगे । ज़रूर वे सुबह-सुबह दरबार साहब ( स्वर्ण मंदिर ) गए होंगे । वहाँ गुरु ग्रंथ साहब के आगे माथा टेक कर उन्होंने गुरबाणी सुनी होगी । उन्होंने सरोवर के पवित्र जल में स्नान किया होगा । और दरबार साहब की परिक्रमा की होगी । उन्होंने अकाल तख़्त के आगे भी माथा टेका होगा और पास कहीं बैठकर उन्होंने कड़ाह प्रसाद का हलवा खाया होगा ।

 फिर दरबार साहब से बाहर आ कर उन्होंने किसी ढाबे में बैठकर छोले-भटूरे का
 नाश्ता किया होगा । किसी दुकान से उन्होंने पापड़-वड़ियाँ ख़रीदी होंगी । कटरा जैमल सिंह से कुछ कपड़े ख़रीदे होंगे । हाल गेट में डी. ए. वी. कॉलेज के पीछे वाली गली में ज्ञानसिंह हलवाई की दुकान पर मलाई वाली लस्सी पी होगी और गजरेला
 ( गाजर का हलवा ) खाया होगा । वहीं कहीं सड़क के किनारे खड़े किसी रेहड़ीवाले
से बढ़िया गज़क ली होगी । फिर उन्होंने क्रिस्टल चौक से सॉफ़्टी खाई होगी । लौटते हुए शायद वे पुतलीघर चौक पर उतरे होंगे । वहाँ सब्ज़ी मंडी से उन्होंने सब्ज़ियाँ ली होंगी । लेकिन इतना सारा सामान लेकर वे गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी तो यक़ीनन नहीं जा पाए होंगे । तब तो उन्हें थोड़ी देर में घर लौट आना चाहिए -- मैं सोचता


            कभी-कभी ऐसा भी होता कि छब्बे पा' जी उदास लग रहे होते । जब वे उदास होते तो कई दिनों तक उदास ही रहते । हम बच्चे सोचने लग जाते कि उनकी उदासी का क्या कारण होगा । आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ में आता है कि पुराने ज़माने में लोगों के पास हँसी का ख़ज़ाना था । जितना चाहे हँस लो , वह भरा हुआ ख़ज़ाना  कभी ख़त्म नहीं होता था । हुआ यह होगा कि लक्कड़दादा-फक्कड़दादा-पड़दादा-दादा-बाप आदि से होता हुआ जब वह ख़ज़ाना छब्बे पा' जी के पास पहुँचा होगा तो वह लगभग ख़ाली हो गया होगा । उसमें हँसी की शायद ही कोई दमड़ी बची होगी । हो-न-हो , छब्बे पा' जी उसी पुराने ख़ानदान के बेचारे वारिस होंगे जिनके ख़ाली हो चुके ख़ज़ाने में अब केवल उदासी की अठन्नी  बची होगी । लेकिन उस प्राचीन ख़ानदान के अगले वारिस छब्बे पा' जी के बेटे के पास क्या बचेगा ? उनके बेटे सुरिंदर के ख़ज़ाने में तो वह उदासी की अठन्नी भी नहीं होगी ।


                       अक्सर छब्बे पा' जी गली में मंजी ( खाट ) डाल कर बैठ जाते । कभी हम बच्चे उनके साथ गली में बंटे ( कंचे ) खेलते , कभी छोटे-छोटे पत्थरों में डोर बाँध कर एक -दूसरे से ' आ गुलाबो काँटियाँ ' खेल रहे होते , कभी वे हमें शतरंज खेलना सिखा रहे होते तो कभी हम उनके कोठे ( छत ) पर चढ़ कर उनकी क़यादत में पतंग उड़ा रहे होते । जब छब्बे पा' जी की पतंग किसी दूसरी पतंग को काट देती तो हम सारे बच्चे
 ' आई बो , बो काटा ' की आवाज़ चारो दिशाओं में फैला देते । छब्बे पा' जी बड़े कुशल पतंगबाज़ थे । उनकी माँझा डोर और पतंग उड़ाने की कलाकारी की चर्चा दूर-दूर तक थी । दूसरे पतंग उड़ाने वाले उनकी पतंग से पेंच लड़ाने से घबराते थे । लेकिन हम सारे बच्चे उन्हें आकाश में उड़ती बाक़ी सारी पतंगें काट देने के लिए उकसाते रहते थे ।

                हम छह-सात लड़के थे । मैं , करमजीत , बिट्टू , शाणे , बंटी , लवली और
टीटू । कभी-कभी हमारा एक और दोस्त तोते भी हमारे साथ हो लेता । छब्बे पा' जी का बेटा सुरिंदर और बेटी सिमरन हालाँकि हमसे उम्र में कुछ साल बड़े थे लेकिन वे भी खेल-कूद में हमारे साथ ही रहते । छब्बे पा' जी जब आस-पास उड़ती सारी पतंगें काट देते और हम बच्चे दूसरे पतंग उड़ाने वालों की भी कटी पतंगें और काफ़ी डोर लूट लेते तब जा कर हमें चैन मिलता । फिर थोड़ी देर छब्बे पा' जी हमें पतंग उड़ाना सिखाते और पेंच लड़ाने की बारीकियाँ बताते । यह शिक्षा पतंग उड़ाने के ' क्रैश-कोर्स ' जैसी होती । इसमें पिन्ना लपेटना , अक्खाँदार , कन्नी डालना , ढील देना हाथ मारना , हवा लगनी जैसे वाक्यांशों का खुल कर प्रयोग किया जाता ।

                 जब हम बच्चे थक जाते , उसी समय चाई जी ( छब्बे पा' जी की माता जी )
 हम सबके खाने के लिए गज़क , रेवड़ियाँ और मूँगफली कोठे पर ले आतीं । साथ में छब्बे पा' जी के लिए अदरक और इलायची डाल कर बनाई गई दूध-पत्ती होती । हम सब बच्चे चाई जी को ' पैरीं पैन्ना हाँ जी ' ( चरण-स्पर्श ) कहते और उनसे ' जींदे रहो ' का आशीर्वाद भी लेते ।

      फिर हम सब हाथ धो कर छब्बे पा' जी के पीछे पड़ जाते ।
 " पा' जी , कहाणी सुनाओ । "
 हम बच्चों को छब्बे पा' जी से कहानी सुनने की लत लग गई थी । यह एक तड़प , एक धुन , एक जुनून की तरह थी ।
 " लै राजे , नेकी और पूछ-पूछ । आ जाओ भई , सारे बच्चेयो । " छब्बे पा' जी की यह आवाज़ सुनते ही बीच समन्दर में भटकता हमारा जहाज़ जैसे किनारे आ कर लंगर डाल लेता ।
 छब्बे पा' जी को इतनी कहानियाँ कैसे आती हैं -- अक्सर हम बच्चे हैरान हो कर यह सोचते । दाढ़ी-मूँछों के बीच मुस्कराते उनके सफ़ेद दाँत मुझे आज भी याद
 हैं । वे हमेशा नीली पगड़ी पहनते थे ।
 " पुत्तर , नीला रंग आकाश का होता है । नीला रंग समन्दर का होता है । बड़ा शांत रंग होता है यह । पर इस रंग में अथाह गहराई होती है । समझे ? " वे कहते । इसलिए उनके घर के पर्दों का रंग भी नीला था ।

 ज़रूर छब्बे पा' जी को ये सारी कहानियाँ चाई जी सुनाती होंगी -- अक्सर हम बच्चे आपस में एक-दूसरे से कहते । चाई जी को देखना , उनसे बातें करना टाइम-मशीन में बैठकर प्राचीनकाल में चले जाने जैसा था । पीछे मुड़ कर देखने पर अब तो मुझे यही लगता है । उनकी एक-एक झुर्री में जैसे सैकड़ों साल बंद पड़े थे । उनके मुँह से निकला एक-एक शब्द एक आदिम गूँज लिए होता । लेकिन उनकी गोद में
 बैठ कर बड़ा सुकून मिलता था ।

 दूसरी ओर छब्बे पा' जी का बेटा सुरिंदर था । उससे बात करना टाइम-मशीन में बैठ कर सुदूर भविष्य में निकल जाने जैसा था । पीछे मुड़कर देखने पर अब मुझे यही लगता है । सुरिंदर हमेशा हेलीज़ कॉमेट , कॉमेट शूमाकर , बिग बैंग , ब्लैक-होल , रेडियो-टेलेस्कोप , रेड-स्टार , लाइट-इयर्स आदि की बातें किया करता था । वह गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी , अमृतसर से एस्ट्रो-फ़िज़िक्स में एम. एस. सी . करना चाहता था । उसका सपना ' नासा ' ( NASA ) जा कर अंतरिक्ष-यात्राएँ करने का था । लेकिन उस समय उसकी बातें हम बच्चों को कम ही समझ आती थीं । हमारे लिए इतना ही बहुत था कि सुरिंदर छब्बे पा' जी का बेटा था । हालाँकि कभी-कभी उसके टेलेस्कोप से मैं भी रात में आकाश के तारे देख लिया करता था ।
   छब्बे पा' जी की बेटी सिमरन तब अठारह बरस की थी । वह तीखे
 नैन-नक़्श , गेंहुआ रंग और भरी-पूरी गोलाइयों वाली सोहणी मुटियार ( सुंदर
युवती ) थी । मुझे उसके साथ रहना , उससे बातें करना अच्छा लगता था । तब मैं तेरह साल का हो गया था और साथ उठते-बैठते या खेलते-कूदते जब कभी मेरी नाक में उसकी युवा देह-गंध पड़ती तो मेरे भीतर एक नशा-सा छा जाता । तब मेरा मन हमेशा सिमरन के आस-पास रहने का करता ।

  कभी-कभी छब्बे पा' जी कुछ दिनों के लिए अमृतसर से पन्द्रह-बीस किलोमीटर दूर अपने पुश्तैनी पिंड ( गाँव ) ' चढ़दी कलाँ ' चले जाते । एक बार स्कूल की छुट्टियों में ज़िद करके मैं भी उनके साथ चला गया । मेरे पिता छब्बे पा' जी के मित्र थे । लिहाज़ा छब्बे पा' जी के भरोसा दिलाने पर उन्होंने मुझे छब्बे पा' जी के साथ उनके गाँव जाने की इजाज़त दे दी ।

 " आप फ़िकर ना करो जी । इसे कुछ नहीं होगा । ये मेरे पुत्तर जैसा है । सुरिंदर और सिमरन भी हैं ना साथ । हम सब इसका ख़याल रखेंगे । " छब्बे पा' जी ने पिता जी के चेहरे पर चिंता की लकीरें देख कर हँसते हुए कहा था ।
 गाँव में एक अपनापन होता है , एक जानी-पहचानी कशिश होती है जो शहर के अजनबीपन से बिल्कुल अलग होती है । आज जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो यही लगता है ।
 जितने दिन मैं छब्बे पा' जी के गाँव रहा , हम ट्यूब-वेल  पर ही नहाते और खेतों में ही दोपहर की रोटी खाते । तब मैं पहली बार ट्रैक्टर पर चढ़ा था । लुंगी और कुर्ते में छब्बे पा' जी उस उम्र में भी बेहद आकर्षक लगते थे । जब वे अपनी बाँह मोड़ते थे तो उनके बाज़ू में मछलियाँ बनती थीं । वे लम्बे , तगड़े जाट सिख थे । उनके चौड़े कंधों पर बैठ कर सरसों के खेतों में घूमना मुझे आज भी याद है ।
 " पुत्तर , रज्ज के खाया-पिया कर । सेहत बणा । " खाने-पीने के मामले में वे पक्के अम्बरसरिए ( अमृतसर के ) थे ।
 चाई जी भी हमारे साथ आई थीं । उस दिन उन्होंने जो मक्की की रोटी और सरसों का साग खिलाया था उतना स्वादिष्ट खाना मैंने कभी नहीं खाया था । लगता था जैसे उनके हाथों में जादू हो । उसी दिन सिमरन ने मुझे अकेले में ' पिच्छे-पिच्छे आंदा , मेरी चाल वेहंदा आईं , चीरे वालेया वेखदा आईं वे , मेरा लौंग गवाचा ' गीत
सुनाया था । हम दोनों टहलते हुए खेतों की ओर निकल गए थे । सिमरन ने फुलकारी वाला गुलाबी सूट पहना हुआ था । तभी तेज़ हवा के एक झोंके से उसकी चुन्नी उड़
 गई थी । मैंने तेज़ी से दौड़ कर चुन्नी पकड़ ली थी । जब मैंने सिमरन को उसकी चुन्नी लौटाई थी तो उसने प्यार से मेरा माथा चूम लिया था ।
 " आप बहुत सोहणे ( संदर ) हो । " मैंने शर्म से लाल होते-होते भी यह कह दिया था ।
 " चल , झूठे । " सिमरन ने बनावटी ग़ुस्से से कहा था हालाँकि उसकी आँखें ख़ुशी से झूम रही थीं और वह खुल कर हँस रही थी । उस दिन सिमरन मुझे बहुत अच्छी लगी थी । मैं उसकी उन्मुक्त खनकती हुई हँसी का दीवाना था ।
उसी शाम छब्बे पा' जी ने मुझे , सुरिंदर और सिमरन को एक ऐसी मार्मिक कहानी सुनाई थी जो आज भी मेरी आँखें नम कर देती है ।
 " पुत्तर , आज मैं तुम सब को एक सच्ची कहाणी सुनाता हूँ । 1971 की भारत-पाक जंग हमने जीती थी । पर अपने फ़ौजियों की क़ुर्बानियों के बाद । " छब्बे पा' जी ने कहानी शुरू की ।
 " जंग ख़त्म होने के बाद भी हमारे दर्जनों फ़ौजी लापता थे । उनके घरवाले उन्हें शिद्दत से ढूँढ़ रहे थे । दो-ढाई महीने बाद ऐसे ही एक फ़ौजी ने अपने घरवालों को फ़ोन किया । फ़ोन पर उसने बताया कि वह जंग में घायल हो गया था , लेकिन उसके एक साथी फ़ौजी ने अपनी जान पर खेल कर उसे बचा लिया । इस दौरान उसका फ़ौजी साथी बुरी तरह घायल हो गया । उसके फ़ौजी साथी के दोनों हाथ और एक टाँग को काटना पड़ा तब कहीं जा कर उसकी जान बच पाई । फ़ोन पर फ़ौजी ने अपने घरवालों को आगे बताया कि उसका फ़ौजी साथी अब अपाहिज हो गया था ।
 उस फ़ौजी ने अपने घरवालों से आगे पूछा कि क्या उसका अपाहिज दोस्त अब उसके घर पर रह सकता है ? उस अपाहिज का अब कोई नहीं । इसलिए फ़ौजी ने अपने घरवालों से गुज़ारिश की कि वे उसके अपाहिज साथी को अपना लें । " हम सब ध्यान से पा' जी की कहानी सुन रहे थे ।
 " लेकिन उस फ़ौजी के घरवालों ने उसे अपने अपाहिज साथी को अपने साथ घर लाने से मना कर दिया । वे उसके अपाहिज साथी का बोझ उठाने को तैयार नहीं थे । यह सुन कर उस फ़ौजी ने फ़ोन बंद कर दिया । "
" फिर क्या हुआ , पा' जी ? " मैंने पूछा ।
" पुत्तर , इसके बाद उस फ़ौजी के घरवालों को उसका कोई अता-पता नहीं लगा । उसने फिर कभी अपने घरवालों को फ़ोन नहीं किया । " छब्बे पा' जी ने उदास आवाज़ में कहा ।
" ऐसा क्यों पा' जी ? " मैंने फिर पूछा ।
" ऐसा इसलिए पुत्तर क्योंकि दरअसल उसके अपाहिज फ़ौजी साथी की कहानी झूठी थी । असल में वह फ़ौजी खुद ही जंग में अपाहिज हो गया था । अपने घर फ़ोन करके वह दरअसल यह जानना चाहता था कि कहीं उसके घरवाले अब उसे बोझ तो नहीं समझेंगे । अपने घरवालों का इम्तिहान लेने के लिए उस फ़ौजी ने उन्हें अपने अपाहिज दोस्त की झूठी कहानी सुनाई थी । घरवालों की बात सुन कर उस फ़ौजी का दिल टूट गया । वह फिर कभी अपने घरवालों से नहीं मिला । " छब्बे पा' जी की आवाज़ में जैसे अथाह दर्द था ।
 कहानी सुन कर हमारी आँखें भी नम हो गई थीं ।
 " आपको यह कहानी कैसे पता , पा' जी ? " मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने पूछ ही लिया ।
 " मुझे यह कहाणी इसलिए पता है पुत्तर क्योंकि यह मेरे जिगरी यार की कहाणी है ।" यह कहते-कहते छब्बे पा' जी की आँखों में भी आँसू आ गए थे ...

 पीछे मुड़ कर देखने पर यह सब किसी बीते हुए युग की बात लगती है। एक प्राचीन कथा । एक पूर्व-जन्म ।
 सावधान , आगे कहानी में कुछ अंधे मोड़ हैं --

               " दशकों पहले एक बचपन था
                 बचपन उल्लसित किलकता हुआ
                 एक मासूम उपस्थिति
                 सूरज चाँद और सितारों के नीचे
                 बचपन चिड़िया का पंख था

                बचपन उड़ती-कटती पतंगें थीं
                 बचपन चाई जी की गोद थी
               बचपन छब्बे पा' जी की कहानियाँ थीं ... "

                                                   -- अपनी डायरी का अंश

 धीरे-धीरे मैं बड़ा हो रहा था । न जाने कब मेरे समय में कई नुकीले काँटे उग आए थे । मुझे लगने लगा जैसे समय ने मुझे धोखा दिया है । मेरी मासूमियत को छला है । यह बोध ही मेरे बड़े हो जाने की शुरुआत थी । दरअसल पंजाब में आतंकवाद का डरावना दौर शुरू हो गया था
 फिर घरवालों ने वहाँ के बिगड़ते माहौल को देख कर मुझे आगे की पढ़ाई करने के लिए दिल्ली भेज दिया ।
 " रब्ब राखा , पुत्तर । " जाते समय छब्बे पा' जी ने मुझे सीने से लगा कर कहा था । हम दोनों का गला रुँध गया था । पलकें भीग गई थीं ।
 धीरे-धीरे मेरा अमृतसर आना कम होता चला गया था । आतंकवाद अपने चरम पर था । धर्मांध आतंकवादी हिंदुओं को बसों से उतार कर गोलियों से भून देते थे । दूसरी ओर सुरक्षा-बलों की गोलियों से कई निर्दोष सिख युवक भी मारे जा रहे थे । चारो ओर दहशत का माहौल था । दर्दनाक वारदातें हो रही थीं । पंजाब के दरियाओं में आग लग गई थी । ऐसे माहौल में जान के लाले पड़े हुए थे ।
 पिताजी ने अपना अमृतसर का मकान कम किराए पर ही चढ़ा दिया और हमारा सारा परिवार दिल्ली आ गया ।
 फिर पता चला कि छब्बे पा' जी जून , 1984 में ऑपरेशन ब्लू-स्टार के समय बड़े पैमाने पर चलाए गए फ़ौजी अभियान की चपेट में आ गए थे । उनके गाँव में किसी की उनसे व्यक्तिगत दुश्मनी थी । उसका रिश्तेदार पुलिस में था । उसकी झूठी निशानदेही पर छब्बे पा' जी को ' ' कैटेगरी का ख़तरनाक आतंकवादी बता कर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और बाद में जोधपुर जेल में बंद कर दिया गया । उन्होंने लाख दुहाई दी  कि वाहेगुरु की सौंह ( क़सम ) , वे सच बोल रहे थे । उन्होंने अपने बच्चों की क़सम खाई कि उनका आतंकवादियों से कोई लेना-देना नहीं था , लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गई । कई साल वे जोधपुर जेल में सड़ते रहे । फिर 1994-95 में ख़राब सेहत की वजह से बड़ी मुश्किल से वे रिहा हो पाए ।
इस बीच सिमरन के मामा और दूसरे रिश्तेदारों ने ज़बर्दस्ती उसकी शादी एक अधेड़ उद्योगपति से कर दी । लेकिन यह बेमेल शादी जल्दी ही टूट गई । जब छब्बे पा' जी जेल से रिहा हो कर घर पहुँचे तब तक तीन साल की लम्बी क़ानूनी लड़ाई के बाद सिमरन का तलाक़ हो चुका था । उनके बेटे सुरिंदर का एक-डेढ़ साल से किसी को कोई अता-पता नहीं था ।
उन्हीं दिनों एक रात मैंने एक सपना देखा । सपने में एक दृश्य -- अतीत में हँस रहे छब्बे पा' जी वर्तमान में रो रहे हैं । लेकिन ऐसे जैसे वैक्यूम में कोई रोता है । उनके आँसू तो दिख रहे हैं पर रुदन सुनाई नहीं दे रहा है ।
सपने में दूसरा दृश्य -- भविष्य की आकाशगंगा के किसी सुदूर नक्षत्र से लौटा उनका बेटा सुरिंदर अपने पिता को वर्तमान में रोता हुआ पा कर उन्हें उनके हँसते अतीत में ढूँढ़ रहा है । वह उन्हें अतीत से भविष्य में ले जाने आया है पर उनका रोता हुआ वर्तमान बीच में बाधा बन रहा है । सुरिंदर छब्बे पा' जी को जिस भविष्य की ओर ले जाना चाहता है उसका रास्ता अमेरिका से हो कर जाता है । लेकिन छब्बे पा' जी डॉलर की गंध से अपरिचित हैं । उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती और उनके मोबाइल का रिंग-टोन ' सतनाम-वाहेगुरु ' है । दूसरी ओर उनके बेटे सुरिंदर के मोबाइल का कॉलर-ट्यून माइकल जैक्सन का धड़ाम-धड़ूम रॉक संगीत बजाता है जो छब्बे पा' जी के पल्ले नहीं पड़ता । सुरिंदर भी अब कोई अजनबी ज़बान बोलने लगा है । बाप-बेटा एक-दूसरे को नहीं समझ पा रहे ... यहीं मेरा सपना टूट गया ।
छब्बे पा' जी की रिहाई के बाद जब मैं उनसे मिलने अमृतसर गया तो उन्हें देख कर मैं डर गया । वे शरीर से अलग हो गई परछाईं-से लग रहे थे । किसी ढही हुई इमारत-से ।
" पा' जी , कोई कहानी सुनाओ । " उनका काँपता हाथ अपने हाथों में लेकर मैंने कहा ।
" मेरी सारी कहाणियाँ मर गई हैं , पुत्तर । भीतर कहाणियों का समंदर अब सूख गया है । " थरथराती हुई आवाज़ में वे बोले ।
 " नहीं पा' जी । कहानियाँ कभी नहीं मरतीं । कहानियों की अमर-बेल सदा हरी रहती है । " मेरे मुँह से खुद-ब-खुद निकल आया ।
" पुत्तर , मेरे बाद मेरी सिमरन का क्या होगा ? " उनकी आँखों में अँधेरा भरा था ।
" वाहेगुरु पर भरोसा रखो , पा' जी । सब सही हो जाएगा । " उनके काँपते हुए हाथों को अपनी हथेलियों में स्थिर करते हुए मैंने कहा ।
सिमरन बगल में बैठी हुई थी । उसकी आँखों में आँसुओं के मोती चमक रहे
थे ।
" जब दुख मेरे पास बैठा होता है
मुझे अपनी परछाईं भी
नज़र नहीं आती
केवल एक सलेटी अहसास होता है
शिराओं में इस्पात के
भर जाने का
केवल एक पीली गंध होती है
भीतर कुछ सड़ जाने की
और पुतलियाँ भारी हो जाती हैं
न जाने किन दृश्यों के बोझ से ... "
--  उस रात मैंने अपनी डायरी में लिखा था ।


अब छब्बे पा' जी नहीं रहे ।
उनके दो भाई पहले ही अमेरिका जा कर बस चुके थे । वहाँ जा कर वे डॉलर के हो कर रह गए थे और अपने मुल्क और रिश्तेदारों को भूल गए थे । उनकी इकलौती बहन शादी के बाद पति के साथ आस्ट्रेलिया चली गई थी । बेटा सुरिंदर अमेरिका जाना चाहता था । बाद में पता चला कि वह एजेंटों के चंगुल में फँस गया था । अवैध रूप से यूरोप में प्रवेश करने के ज़ुर्म में वह इटली की किसी जेल में बंद था । बहुत मुश्किल से इटली के भारतीय दूतावास की मदद से वह रिहा हो पाया । चाई जी भी पूरी हो चुकी हैं । वे छब्बे पा' जी के गुज़र जाने का ग़म नहीं सह पाईं ।
मेरी शादी हो चुकी है । मेरे दो बच्चे हैं । बेटा बारह साल का है और बेटी सात साल की है । अब मैं छब्बे पा' जी से सुनी हुई तमाम कहानियाँ अपने बच्चों को सुनाता हूँ । मैंने छब्बे पा' जी से कहा था -- कहानियाँ कभी नहीं मरतीं । छब्बे पा' जी आज भी मेरे भीतर जीवित हैं । हर रविवार मैं , मेरी पत्नी और मेरे दोनो बच्चे -- हम सब इलाक़े के एक अनाथालय में जाते हैं । यहाँ मैं अनाथ बच्चों को भी छब्बे पा' जी से सुनी हुई कहानियाँ सुनाता हूँ और उन बच्चों को हँसता-खिलखिलाता हुआ पाता हूँ । मेरी सुनाई कहानियाँ सुनकर मेरे अपने बच्चे भी खुलकर हँसते हैं । मैं उनकी वही निष्कपट और मासूम हँसी बचाए रखने की जद्दोजहद में जुटा हूँ । इस प्रयास में मेरी पत्नी और उनकी माँ सिमरन भी मेरे साथ है । जी हाँ , मैंने सिमरन से शादी कर ली । छब्बे पा' जी भी यही चाहते थे ।
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 सुशांत सुप्रिय
 ए-5001 ,गौड़ ग्रीन सिटी ,
 वैभव खंड ,इंदिरापुरम ,
 ग़ाज़ियाबाद -201014( उ. प्र. )
 मो: 8512070086
 ई-मेल : sushant1968@gmail.com