रविवार, 23 नवंबर 2014

पुस्तक समीक्षा - माफ करना हे पिता



   
            

दिनेश चन्द्र भट्ट गिरीश




         नैनीताल मुद्रण एवं प्रकाशन सहकारी समिति से प्रकाशित शंभु राणा की पुस्तक माफ करना हे पिता’ 36 व्यंग्यों का संग्रह है। संस्मरणात्मकता व्यंग्यों की प्रमुख विशेषता है। बहुत तल्ख अंदाज में सामाजिक विद्रुपताओं पर जबरदस्त ढंग से प्रहार किया गया है। समाज के जो आवरण समाज की सुन्दरता का आभास कराते हैं आवरण मुक्त होने पर स्थिति को घृणास्पद बना देते हैं। छद्म आदर्शों पर लेखक का रोष मुखर हो उठता है-‘‘........युद्ध के वास्तविक कारणों, जो कि अमूमन कुछ लोगों के अपने स्वार्थ होते हैं, पर तर्क संगत बात करें, वह गद्दार है। सामान्य दिनों में देश को अपनी माँ कहकर उसके साथ बलात्कार करने वाले अपनी माँ के खसम उन दिनों खूब भक्ति का दिखावा करते हैं।Þ

            हर युग में व्यवस्था के विरूद्ध अभिव्यक्ति व्यंग्यकार का काम्य है। व्यवस्थाएँ बदलती हैं विद्रूपताएँ नई-नई आकृतियाँ ग्रहण कर समाज को प्रभावित करती हैं। कबीर से लेकर वर्तमान तक व्यवस्थ्काओं पर व्यंग्यकार मुखर रहे हैं। शिक्षा व्यवस्था जिसे एक संवेदनशील व्यक्ति समाज का आधार बताता आया है लेकिन हमारी व्यवस्था उसे किस ढंग से नेस्तनाबूत करने पर तुली हुई है। मध्याह्न भोजन व्यवस्था जिसके कारण शिक्षण पर कितना दुष्प्रभाव पड़ रहा है; इसकी बाननी देखिए-‘‘रेत में सर छिपा लेने से तूफान की ताकत कम नहीं होती...........। शिक्षा को तो साँस लेने की तरह स्वाभाविक होनी चाहिए। लानत भेजिए इस व्यवस्था को जहाँ शिक्षा देने और मछली फाँसने में फर्क न हो कि लालच देना पड़े, चारा डालना पड़े। आओ बच्चों, अ आ पढ़ो फिर हम तुम्हें भात देंगे अहा यम-म-म।Þ .................. इस स्यवस्था का तो मतलब हुआ कि बच्चा खा-पीकर संड मुसंड हो जाए, मानसिक विकास की जरूरत नहीं। 
 
            बेरोजगारी का दंश झेल रहे पढ़े लिखे नौजवानों पर लेखक पुनः व्यवस्था की असफलता तथा बेरोजगार नौजवानों की व्यथा को प्रस्तुत करता है। जहाँ भी बेरोजगार जाता है वहीं उसे अनचाही सलाओं का सामना करना पड़ता है। हमारी व्यवस्था के नीति निर्धारक उन्हें नौकरी न कर व्यवसाय करने की सलाह देते रहते हैं। वहीं पारिवारिक सदस्यों का स्वभाव भी उन्हें विचलित करने के लिए कम नहीं है। साथ ही साथ एन0जी00 वालों पर करारा प्रहार किया है कि लोगों को जागरूक करने का जिम्मा आम व्यक्ति का और मलाई खाने का हमारा-‘‘हाय रे सादगी से लिपटा कमीनापन, तू खुद विश्वभ्रमण कर और मैं अपने घर खाकर बाजार में दुकानदारों से मार खाऊँ और लिफाफे बनाऊँ।Þ पिता के रिटायर हो जाने पर बेरोजगार पर क्या असर होता है-‘‘उनकी चुप्पी बोलने से ज्यादा चुभती है......... और आज पिताजी ने अर्थपूर्ण ढंग से अपनी बात भी कह दी एक सूचना के रूप में कि आज से ठीक एक वर्ष बाद मैं रिटायर हो जाऊँगा।Þ जो व्यक्ति भी बोराजगारी के दौर से गुजरा हो वही जानता है कि यह अच्छा समय तो नहीं ही होता-‘‘आज एक लतीफे नुमा कहावत सुनने को मिली कि जब आदमी का समय विपरीत चल रहा हो तो ऊँट की सवारी करते हुए भी कुत्ता काट लेता है।........... हमारी पीढ़ी एक दुर्घटना का नतीजा है..... वर्ना हमारी ऐसी कुकुरगत नहीं होती।Þ

            पुस्तक की प्रतिनिधि व्यंग्य माफ करना हे पिता में पिता की मृत्यु के बाद उन्हें उनके गुणों एवं दोषों सहित याद किया गया है। भावुकता की बिल्कुल गुंजाईश नहीं है। अपने पिता को कहीं भी आदर्श न मानकर अच्छाई और बुराई का सम्मिश्रण ही माना गया। जबकि होता यह है कि मृत्यु के बाद पिता देव-सम ही हो जाते हैं लेकिन लेखक के लिए उनका रोल घटिया अभिनेता की तरह ही है-‘‘लेकिन मैं उन्हें एकदम ही पीता नहीं कहने जा रहा। इसलिये नहीं कि मेरे बाप लगते थे बल्कि इसलिए कि चाहे जो हो आदमी कुल मिलाकर कमीने नहीं थे।Þ पिता के साथ बिताए 36 वर्षों का संस्मरणात्मक व्यंग्य में लेखक के पिता सांख्यकी विभाग में चपरासी थे। संस्मरणों का सिलसिला देहरादून और अल्मोड़ा का है। माता हमेशा बीमार रहने वाली जिस कारण पिता को ही बच्चों का ख्याल रखना पड़ा था। माता की मृत्यु के एक वर्ष बाद पिता द्वारा किए गए पुनः विवाह लेखक के जीवन की एक जबरदस्त फँास थी जिसे वह कभी अपने पिता को क्षमा नहीं कर पाया। ‘‘इसके पीछे सबसे बड़ा कारण मुझे बताया गया कि मेरी देखभाल कौन करेगा!........ कारण शुद्ध रूप से शारीरिक था इतनी समझ मुझमें तब भी थी (बाकी आज भी नहीं)। पिता अपने नीजी, क्षणिक सुख के लिए शादी करना चाह रहे थे। ............ मैं उनकी इस हरकत (शादी) को कभी भी नहीं पचा पाया।Þ विमाता से भी चार सन्तानों का जन्म होता है। ‘‘उन्होंने सन्तति के रूप में अपनी अन्तिम रचना रिटायरमैण्ट के बाद प्रस्तुत की। गोया रिटायर कर दिए जाने से खुश न हो और अपनी रचनात्मक क्षमता साबित कर उन्हें सरकार को मुहतोड़ जवाब दिया हो।Þ 

        रिटायरमैण्ट के बाद उन्हें लॉटरी के चस्के तथा लॉटरी का ज्ञाता होने का दर्प पिता हँसी के पात्र ही ज्यादा नजर आते हैं। रचना यत्र-तत्र हँस-हँसकर लोटपोट कर देने के साथ ही लेखक की आन्तरिक व्यथा, उसके एकाकीपन तथा अपने मित्रों पर बोझ बन जाने वाली स्थिति लेखक के प्रति संवेदना जगाती है। स्वप्न विश्लेषण के आधार पर नंबर बताने की सिद्धहस्तता की बानगी देखिए-‘‘सपने में अगर शादीशुदा औरत दिखे तो मतलब है कि आज जीरो खुलेगा, क्योंकि औरतें बिन्दी लगाती है। कुँवारी लड़की का नम्बर अलग बनता था और अगर प्रश्नकर्ता सपने में महिला के साथ कुछ ऐसी-वैसी हरकरत कर रहा हो उससे कुछ और नम्बर निकलता था।Þ
 
            सभी गुणों (कर्मठता, हुनरमंद, खिलाने-पिलाने के शौकीन आदि) एवं अवगुणों का समुच्चय माफ करना हे पिताव्यंग्य रचना लेखक के अनुसार-पिता जैसे थे मैंने ठीक वैसे ही कलम से पेंट कर दिए। न मैंने उनका मेकअप किया, न उनपर कीचड़ उछाला’- अक्षरशः सही साबित होता है।

            विवाह नामक संस्कार को भी बारीकी से देखने की जुर्रत लो साहब गुजर गये शादियों के भी दिन नामक व्यंग्य में की गई है। बाराती बनकर किया गया छिछोरापन परिणामस्वरूप पिटाई हो या दुल्हन की विदाई के समय रूलाई और उसी वीडियो को देखकर हँस-हँस कर दोहरी हो जाना या बैण्ड बाजे के साथ झुनझुना बजाने वाले की बेचारगी हो- ये सभी शादी के विविध रंग हैं जिनका चित्रण लेखक की पैनी नजर से कैसे बच सकते हैं। शादी के समय दुल्हा किसी संस्थान में अच्छे ओहदे पर स्थापित तथा लड़की कान्वेण्ट एजुकेटेड ही नजर आते हैं। समय बीतते-बीतते दूल्हा बेरोजगार तथा दुल्हन भी वैसी पढ़ी लिखी नहीं होती जैसे उसे बताया गया था। ‘‘तो साहब कुल मिलाकर आज तक न तो किसी को अपने ख्वाबों का हूबहू शहजादा मिला न शहजादी। ............. वैसे भी रील लाईफ और रियल लाईफ में धरती आसमान का अन्तर होता है ............ तो लड़कियाँ रोती हैं विदाई के समय तो ठीक ही रोती हैं और बाद में शादी की वीडियो की रिकार्डिंग देखते हुए हँसती हैं तो क्या बुरा करती हैं? Þ

     दो इकम दो ........ में अपने स्कूली दिनों की स्मृतियों से लबालब है कि किस प्रकार पढ़ाई की प्रक्रिया में यांत्रिकता तथा कतिपय शिक्षक-शिक्षिकाओं की फूहड़ता का संस्मरणात्मक चित्रण की बानगी देखए-‘‘एक दिन हेड टीचर जी ने दरवाजे से क्लास में झांका। अरे शीला सुन तो। शीला जी उनके पास गई-हाँ दीदी? हेड टीचर कहने लगी-हाय राम, मैं पेटीकोट उल्टा पहन लाई हूँ रे आज। क्या करूँ बतातो, सीधा पहन लूँ? शीला जी ने कहा-रहने दो दीदी कौन देख रहा है, घर जाकर पहन लेना। उन्हें बात पसंद आई, उल्टे से ही काम चला दिया।Þअध्ययन और अध्यापन का यथोचित सम्बन्ध सृजनात्मकता से है, जहाँ खानापूर्ति ही एक मात्र कार्य रह जाता है वहाँ यांत्रिकता और कृतिमता का आना स्वाभाविक है। तब शिक्षण सुचारू बनाने के लिए शारीरिक दंड ही अपनाये जाते रहे हैं। इस कारण शिक्षण प्रक्रिया एक बोझ बनकर ही रह जाती है। मार से बचने की नई-नई तकनीकें विद्यार्थी विकसित कर लेता है। ‘‘दिया हुआ काम बच्चे अगर न कर पाये तो उसे बिच्छू घास का जायका लेना पड़ता था या एक बड़ा सा पत्थर सर पर रखकर पीरियड भर धूप में खड़े रहना पड़ता था। ............... हमनें आत्मरक्षा के कुछ तरीके खोज लिए थे। मसलन वे गाल पकड़कर खींचे तो मुंह का सारा थूक खीचे जा रहे गाल की ओर शिफ्ट कर दो।Þ

            मनुष्य की आदम इच्छा रही है कि वह पूर्ण मर्द कहलाए। इसी लालसा को भड़काने और समग्रतः परितुष्ट कराने का दावा करने वाले दवा विक्रेता सड़क के किनारे मजमा लगाए हुए एक तथाकथित मर्द को हमेशा से आकर्षित करते आए हैं। मदारियों-दवाफरोशों का जमाना शीर्षक के अन्तर्गत लेखक ने दवा विक्रेताओं की विक्रय-शैली को व्यक्त किया है कि दवा से अधिक उनके डायलाग किस प्रकार आकर्षण के केन्द्र होते हैं। ‘‘बकौल उनके अक्सर भालू घास-लकड़ी को जंगल गयी महिलाओं पर क्यों झपटता है, क्योंकि वह शिलाजीत खाता है। कुछ मिलाकर वह चीज इतनी गर्म थी कि ग्रीन पीस वाले उन्हें बोलना सुन लेते तो पर्यावरण के नाम पर जरूर मुकदमा कर बैठते।Þ एक ही लक्ष्य और साधन कि किसी भी प्रकार स्वयं को सन्तुष्ट करने की अदम्य कामना का ईलाज-‘‘सभी दवाफरोशों की बातों का एक ही सार होता मानो औरत कोई अवैध निर्माण हो और पुरूष को चाहिए कि उसे ढहा दें।Þ सभी जानते हैं कि - दवाविक्रेता लोगों को ठग रहे हैं लेकिन आज उदारीकरण के नाम पर देश के करोड़ों का चूना लगाने वालों का तमाशा देखने के लिए देश अभिशाप है। करोड़ों का बजट अश्ली तमाशों में लिप्त हाइटैक तमाशागीर कब देश देश की छाती पर मॅूग दलते रहेंगे। ‘‘ इन बड़े मदारी जादूगरों का तमाशा, इस देश की जनता ने न जाने कब तक झेलने को अभिशाप है, जबकि इन छोटे सड़क छाप मदारियों की अब सिर्फ यादे ही बाकी रह गई हैÞ

      व्यंग्य संग्रह माफ करना है पिता लेखक की व्यावहारिक सोच का परिणाम है कि कथनी और करनी के बीच का फासला है उसी की उपज है यह व्यंग्य रचना। व्यंग्य रचना कागद लेखी से ज्यादा ऑखन देखि का परिणाम है। भाषा में चुटीलापन है जिस भाषा की अभिव्यक्ति में संकोच हो सकता है उसे बेखौफ होकर व्यक्त किया गया है। वही भाषा जो आम जन के बीच व्यवह्त होती है अगर सहन करना मुश्किल हो जाता है तो वह स्वाभाविक तौर पर फट पड़ती है। उदाहरणार्थ- ‘‘तो यार कभी -कभार किसी न किसी बहाने साम्प्रयादिक फसाद कर लिया करो। बहाने बहुतेरे हैं। भारत-पाकिस्तान का क्रिकेट मैच ही सही। क्योंकि हमें अपने बाप के मरने का उतना अफसोस नहीं होता जितना सचिन के 99 पर आउट हो जाने पर होता है। तो यारो दंगा-संगा टाइप का कुछ न कुछ होता रहना चाहिये शहर में ।Þ

          ‘‘इस देश के अधिकांश बुद्धिजीवियों की कोई भी समस्या तब तक टच नहीं करती जब तक खुद उनकी छाती पर घूंसा न पड़े। गीदड़ों के दरवार में फर्जी सलाम करने वाले शेर हैं ये सब।Þ नये-नये मुहावरों के प्रयोग जो लिखित स्वरूप में नहीं ही होते उनका उपयोग लेखक ने शिद्द्त से किया है- यथा खुला खेल फरूखाबादी, गोली देना आदि। स्थानीय शब्दों (चुतिया के, कुकुरगत्त, लौंडे लफाड़े, शिबौशिब आदि ) का प्रयोग करके भाषा की स्वाभाविकता को बड़ा दिया है व्यंग्य संग्रह की पठनीयता जबर्दस्त है। अन्ततः कहा जा सकता है कि रचना पठनीय एवं संग्रहणीय है।


1 टिप्पणी:

  1. ‘‘इस देश के अधिकांश बुद्धिजीवियों की कोई भी समस्या तब तक टच नहीं करती जब तक खुद उनकी छाती पर घूंसा न पड़े। गीदड़ों के दरवार में फर्जी सलाम करने वाले शेर हैं ये सब। sundar...

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