गुरुवार, 20 अगस्त 2020

'अपना खून' - समीक्षक-रामप्रसाद

 
उपन्यास 'अपना खून' -विक्रम सिंह

विक्रम सिंह का उपन्यास 'अपना खून' पहाड़ी जीवन का मार्मिक पक्ष हमारे सामने लाती है। यह उपन्यास, पहाड़ी लोगों की भूख, गरीबी, और उनकी तमाम लाचारियों के साथ-साथ वहां के लोगों की सादगी और अपार सुंदरता को बहुत सहजता से चित्रित करते हुए आगे बढ़ती है । इस क्रम में बेमेल विवाह, बेरोजगारी और पहाड़ से लोगों के पलायन जैसे बड़े विमर्शों को बिना किसी लाग-लपेट के उपन्यासकार ने विविध रूपों में अंकित किया है। विक्रम सिंह अच्छे किस्सागो हैं। अपनी धरती और अपने पहाड़ से जुड़कर लिख रहे हैं।

 
पहाड़ व पहाड़ी-जीवन,परिवेश व वहाँ की समस्याओं को लेकर एक बेहतरीन उपन्यास को बड़े परिश्रम से लिखा है लेखक विक्रम सिंह जी ने! उपन्यास शुरू होता है और उपन्यासकार उपस्थित रहता है पूरे उपन्यास में! उपन्यास पढ़ते जाते हैं ,आँखे शब्द-दर-शब्द पढ़ती जाती है और दीमाग में दृश्य बनते जाते हैं! उपन्यास में इतिहास का समावेश भी उपन्यास की आवश्यकता के साथ वर्णित है और हमें हमारे बीते वक़्त की याद को हरा कर जाता है!दो दशक पूर्व घटी घटनाओं की यादें पुनः हो आती है!बस समाजवादी सरकार का कारनामा नहीं बताया लेखक ने,शायद कुछेक विवशता होगी!लेखक को आयुर्वेद की दवाईयों का भी अनुभव है जो उपन्यास के शुरू में ही मिल जाता है,गांववाले मंहगी दवाईयों के बदले प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से अपने को व अपनी उस जेब को बचाये रखते हैं जो पहिले से ही खस्ताहाल होती है!

उपन्यास के शुरूआत में उत्तराखंड़ राज्य के संघर्ष व पहाड़ो में ब्रिटिश के आगमन-गमन के ब्यौरे हैं,जो लेखक की इतिहास की रूची का उदाहरण हैं और कहानी की नीव भी!दीपा के पिता की मृत्यु उसी आंदोलन के दौरान हो जाती है और परिवार रूपी गाड़ी का पहियाँ ऐसा खराब होता है कि परेशानियाँ सदा के लिये या स्थायी आवास बना लेती हैं!परिवार में अधिक बच्चों का होना सुखदायी होता है यदि आय निश्चित हो रही हो अन्यथा वही बच्चे कष्टदायी लगने लगते हैं और जैसे-तैसे जीवन के समुद्र में तैराकी कर पार उतरने लायक हो पाते हैं!

जीवन के सबसे हसीन लम्हे वो और उस समय घटित होते हैं जब हम किशोरावस्था की सीमा को पार कर युवावस्था के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं!पर वे लम्हें हरेक की जिन्दगी में हों ऐसा भी नहीं होता,किसी को झलक मिल जाती है और वह उसी के सहारे पूरा जीवन व्यतीत कर जाता है !बहुत सारों को तो जिन्दगी ऐसे झंझावतों में घुसा देती है कि बस्स...

'रहने के काबिल तो न थी यह इब्रत सराय

इत्तेफाकन इस तरफ अपना भी आना हो गया' 'मीर'

ऐसे ही उपन्यास की मुख्य पात्र दीपा के जीवन के वे दिन शुरू होते हैं और शुरू होते ही समाप्त हो जाते हैं!इंदर के साथ मेलजोल बढ़ता है मगर परिणाम तक पहुंच नहीं पाता!क्यूं नहीं पहुंच पाता,ये कहानी की मुख्य थीम है!सपनों के मरने का दर्द वही समझ सकता है जिसने सपने देखे हों,और दम तोड़ते हुये भी देखा हो सपनों को!

मां की बीमारी के इलाज के लिये शहर जाना और समुचित व्यवस्था का न हो पाना भी ये दर्शाता है कि देश की अधिकाश जनता आज भी मूलभूत सुविधा से वंचित है!गरीब को गम्भीर बिमारी मृत्यु का न्यौता होता है!धन  व सुविधा के अभाव में वही प्राप्त हो पाता है!!ग्रामीण-जीवन छोटी बातों में ही जीवन को उत्सवमय बना लेते हैं!पहाड़ी परिवेश की असुविधा में अध्यापक,डॉक्टर या अन्य सरकारी सेवक जो जनता के लिये नियुक्त होते है,पर अपनी असुविधा को देखकर पलायन कर जाते हैं और पीछे वो जनता रह जाती है जो अभाव में जीने की आदी है!पोस्टमैन हरेक जगह के भ्रष्ट हैं!डाक की पूरी सामग्री हाथतक पहुंचाना कर्म है उनका पर उसके लिये नज़राना चाहिये होता है,कहानी में यह भी अनायास समझ में आता है,जब एक चिट्ठी के लिये दो रूपये ले लेता है पोस्टमैन इंदर से!

उपन्यास में जो एक और तथ्य है वह ये कि ,'प्राकृतिक खनिज व अन्य सम्पदा से परिपूर्ण जितने राज्य हैं वहां निर्धनता का स्थायी वास है,धन-सम्पदा का दोहन तो सरकारी नीतियों से लाभ लेनेवाले पूंजीपति उठा ले जाते है!इसलिये वहाँ की गरीब युवापीढ़ी अपने सपनों की होली जलाकर काम व धनोपार्जन के लिये दूर-दराज के क्षेत्रों में चले जाते हैं,जहाँ वे हाड़तोड़ परिश्रम करते हैं और मुआवजे के ऐवज में इतना ही पा पाते हैं कि,'मैं भी भूखा न रहूं,परिवार न भूखा सोय!'साधू के लिये कुछ नहीं बच पाता!आगे जो   उपन्यास की कहानी है वह शीर्षक के हिसाब से है!आज के समाज में भी लोगों को संतान और वह भी पुत्र की इच्छा प्रबलता से घेरे हुये है!और इसी चाह में नायिका फंसती है और उपन्यास भावपूर्ण होता जाता है!उपन्यास में दो जगह लेखक का विद्रोही स्वर मुखर होता है!पहिला इकबाल की पहली पत्नी के द्वारा ये कहते हुये कि,'अगर उसे लड़की मिल सकती है,तो क्या मुझे लड़का नहीं मिल सकता!'दूसरे कलावति के द्वारा!रूपसिंह जब दूसरी शादी की बात करता है कलावती से संतानप्राप्ति के लिये तो कलावती का क्रोधपूर्ण प्रतिवाद,'आज यह कमी अगर तुम्हे होती तो क्या तुम मुझे दूसरे के पास जाने देते?'

रिश्तों की स्वछंदता से उपजी कमी के धरातल पर पूरे  उपन्यास की कहानी बांधे चलती है!

बहुत कुछ और भी है कहने के लिये,बस संक्षेप में ही बात सही लगती है!

 शुरू से अंत तक पाठक को बांधे रहता हैं'बिल्कुल सही और सटीक कहा है!

फिर मिलते हैं इसी प्रस्तुति की अगली कहानी के संक्षिप्त टिप्पणी के साथ!

"मेरे हुलिये पर हंस पड़ा था कोई,

रो दिया मेरी शायरी सुनकर!''
 
समीक्षक-रामप्रसाद
केरल
 
Apna Khoon https://www.amazon.in/dp/8194652685/ref=cm_sw_r_wa_apa_i_taipFb14P9VA3
                         

                  



 

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