रविवार, 23 अगस्त 2020

सुमित दहिया की कविताएं-

 

 

             16.09.1988, फरीदाबाद (हरियाणा)


शिक्षा : राजनीति विज्ञान,विधि (LAW) में स्नातक और स्नातकोत्तर
भाषा-ज्ञान : हिंदी,अंग्रेजी, हरियाणवी
प्रकाशित कृतियाँ : 'मिलन का इंतजार (काव्य संग्रह-अद्वैत प्रकाशन), 'इल्तिज़ा' (ग़ज़ल संग्रह-अयन प्रकाशन) 'खुशनुमा वीरानगी' (ग़ज़ल संग्रह-अद्वैत प्रकाशन) ,खंडित  मानव की कब्रगाह' (गद्य कविता संग्रह-अतुल्य प्रकाशन) और आवाज़ के स्टेशन ( काव्य संग्रह-अद्वैत प्रकाशन )

साहित्यिक ऑफ और ऑनलाइन पत्र,पत्रिकाओं में प्रकाशित:- वागर्थ (कलकत्ता), अंतरराष्ट्रीय पत्रिका आधारशिला, हिंदुस्तानी ज़बान युवा (मुम्बई), सोच-विचार (बनारस), शीतल वाणी (सहारनपुर), व्यंग्य यात्रा (दिल्ली), विभोम स्वर, राष्ट्र किंकर, अक्षर पर्व (रायपुर), समय सुरभि अनंत ( बेगूसराय ), पोएटिक आत्मा, साहित्य कुंज, जनसंदेश टाइम्स (लखनऊ), पतहर पत्रिका, प्रेरणा अंशु ( दिनेशपुर )
इसके अलावा ऑनलाइन साक्षात्कार औऱ विभिन्न विषयों पर कई बार संवाद किया है।

सुमित दहिया की कविताएं

1- घर

तुम्हें घर की परिभाषा बताते वक़्त
कहाँ से शुरू करू
यह समझ नही आ रहा
ये मिन्नत और मेहनत के बीच खींची
एक महीन रेखा का नाम है
या फिर नई, पुरानी भावनाओं की
आहुतियों का जोड़ है
क्या ये विपदाओं का तोड़ है

ओ समझदारी का आयतन नापने वाले गोल ग्रह
तूने तो इसे ईजाद नही किया था
फिर कैसे ये तेरे और आसमान के बीच
वर्गाकार उदासी बनकर ऊपज आया
किसने कर्क रेखा के चारो तरफ चला दी
यह बहुमुखी बंदूक

तेरी प्रकृति में हिलते हुए असंख्य पत्तों से उत्पन्न
अनंत ध्वनि के विस्तार में निहित
किसी स्वर,किसी उच्चारण में
यह विडंबना-पूर्ण ठहराव व्यापत नही है
प्रेम की अविरल धारा की तासीर भी केवल बहाव है

जीवन की आखिरी सांस में समाहित
पहली इच्छा का कठिन रास्ता भी
इसी घर के संकरे गलियारे से होकर गुजरता है।

2-अंतिम इच्छा 


तुम्हारे प्रेम से ऊपजकर
मैं अनेक रिश्तों की खरपतवार नही बनना चाहता
इसलिए उग रहा हूं
भविष्य की और
मेरे ह्रदय के पायदानों में अटकी धूल का
प्रत्येक कण गवाह है, तुम्हारे आने-जाने का
और इन स्मृतियों में जब-जब विवेक आता है
मैं अचानक चोंक पड़ता हूं
जैसे मध्य्म रोशनी के एकदम तेज़ होते ही
ताज़ा शिशु की अधमुंदी आंखे चोंक पड़े
पिंघलती सांसों के पर्दो के पीछे सदा मौजूद है
यौवन का घना जंगल
हाँ तहकीकात इस बात की होती है
कि आज का तथाकथित प्रेम है तो
उसमे मौजूद प्राणी कितने है

अपने बचपन के दिनों में
जब बाल्टी के साथ मैं कुएं में गिरता था
तब पानी के अक्स में तैरती कई तस्वीरे  देखता था
और महसूस करता था
बहुत सारे शीर्ष प्रेम जागरण
जिन हाथों ने इस जलीय स्पर्श की  
बादशाहत को उठाया था
वे अपने जीवन के उस पड़ाव में पहुँच चुके है
जहाँ पैदा होने वाला हरेक भाव
काफिले को केवल एक दिशा की तरफ धक्का देता है
वास्तविक घोषणा के उसूल
अगर गुनाह नही हुए है
तो सत्य आज भी आईना बना रहेगा
और उसके अंदर तैरती परछाईयों के कई आयोजन
अब भी जानते होंगे
कि यह प्रेम रूपी झरना आखिर फूटता कहाँ से है
यह ओस की बूंदों का प्रथम सौभाग्य छूटता कहाँ से है

मेरे अंदर उमड़ते भावनाओं के कई इंकलाब
जब यह पूछने आते है
कि तुम कविता लिखते क्यूँ हो
तो उनसे हर बार यही सवाल करता हूं
कभी ये भी तो पूछो
मैं कविता पढ़ता क्यूँ हूं
सुनो,अभी इकठ्ठा मत करना अहाते के बाहर टपके
उस अज्ञात पसीने को
क्योंकि एक अरसे बाद वहां जरूर कोई आएगा
उन विचलित उदास बूंदों में पड़ी
तुम्हारी अंतिम इच्छा सूंघने।


संपर्क : सुमित दहिया 

 9896351814, 8054666340
E-mail : dahiyasumit2116@gmail.Com



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